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सुकून-ए-क़ल्ब

दिल का इतमीनान, दिल की शांति, आराम, सहायता, चैन और सुख

ख़िल्क़िय्या

प्राकृतिक, फ़ित्री

खिस्यानी बिल्ली खम्बा नोचे

जिसे क्रोध आ रहा हो वह अपनी खीझ या क्रोध दूसरों पर उतारता है, लाचारी में आदमी दूसरों पर क्रोध करता है, लज्जित व्यक्ति दूसरों पर अपनी लज्जा उतारता है, निर्बल की खीझ

सुरूर

मन-मस्तिष्क की शांति या सुकून प्रदान करने वाली अवस्था, ख़ुशी, आनंद, प्रसन्नता, मस्ती, तन्मयता

बे-हिजाबी

बेे-पर्दा होना, बेपर्दगी, घूँघट उठा देना, खुलेबंदों फिरना (स्त्री का)

शरीक-ए-हयात

ज़िंदगी का दोस्त या साथी, अर्थात: जीवनसंगिनी, पत्नी, भार्या, पति

मशवरत

आपस में सोच विचार एवं सलाह या राय का आदान-प्रदान करना, सलाह, मशवरा, परस्पर सुझाव

सितमगर

(प्रायः कविता में) प्रेमिका, माशूक़, महबूब

कोशिश

कोई काम करने के लिए विशेष रूप से किया जानेवाला प्रयत्न, मेहनत, दौड़ धूप, प्रयत्न, प्रयास, चेष्टा, उद्योग, श्रम, उद्यम, उपाय, परिश्रम

बे-नियाज़

जिसे किसी से कुछ लेने की इच्छा न हो निःस्पृह, स्वच्छंद, आज़ाद, बेपरवाह

दीद के क़ाबिल

देखने के लायक़, देखने योग्य

क़ाबिल-ए-दीद

देखने लायक़, अच्छा दिखने वाला

आठ बार नौ त्योहार

सुख-सुविधा और आराम का शौक़ या लगन ऐसा बढ़ा हुआ है कि युग और समय उसको अल्प व्यय नहीं करने देता

चमनिस्तान

ऐसा बाग़ जहाँ फूल ही फूल हों, ऐसी जगह जहाँ दूर तक फूल ही फूल और हरा भरा नज़र आए, वाटिका, चमन, बाग़

'औरत

जाया, भार्या, पत्नी, जोरू

ताग़ूत

शैतान, अत्यन्त निर्दय और अत्याचारी व्यक्ति

मन-भावन

मन को भाने या अच्छा लगने वाला

दादरा

संगीत में एक प्रकार का चलता गाना (पक्के या शास्त्रीय गानों से भिन्न), एक प्रकार का गान, एक ताल

मज़दूर

शारीरिक श्रम के द्वारा जीविका कमाने वाला कोई व्यक्ति, जैसे: इमारत बनाने, कल-कारख़ानों में काम करने वाला, श्रमिक, कर्मकार, भृतक, मजूर

ख़ैर-अंदेश

भलाई की बात सोचने वाला, वह शख़्स जो किसी की भलाई चाहे, शुभचिंतक

मुहावरे

यह भारतीय मुहावरों का एक शब्दकोश है, जो रेख्ता फ़ाउंडेशन की एक पहल है। इसमें सदियों से प्रचलित पारंपरिक कहावतों और मुहावरों का एक मूल्यवान संग्रह शामिल है, जो भारतीय उपमहाद्वीप की संस्कृति, समाज और दैनिक जीवन को प्रतिबिंबित करता है। यह शब्दकोश आलोचकों, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों तथा भाषा और साहित्य के प्रेमियों के लिए एक अत्यंत उपयोगी और विश्वसनीय संदर्भ स्रोत के रूप में कार्य करता है।

प्रमुख मुहावरे

मुहावरों की सूची

संबंधित परिणाम

गए जोबन भटार

जवानी चले जाने के बाद पति और समय बीत जाने के बाद, ज़रूरत की चीज़ मिलने का क्या फ़ायदा

गए कना गट टूटी आस, बाहमन रोवें चूल्हे पास

काम का वक़्त निकल गया अब बैठे रोया करो (कनागट, आसोज के महीने के पंद्रह दिन जिन में हिंदू, ब्रह्मणों को ख़ूब खाना खिलाते हैं)

गए कना गट टूटी आस، बामन रोवें चूल्हे पास

काम का वक़्त निकल गया अब बैठे रोया करो (कनागट, आसोज के महीने के पंद्रह दिन जिन में हिंदू, ब्रह्मणों को ख़ूब खाना खिलाते हैं)

गए कटक, रहे अटक

यह कहावत उस अवसर पर बोलते हैं जब किसी के वापस आने की आशा बहुत कम हो

गए थे नमाज़ बख्शवाने रोज़े गले पड़े

जब कोई काम लाभ के लिए किया जाय और उसमें हानि हो तो ऐसा कहते हैं

गए थे रोज़े छुड़ाने नमाज़ गले पड़ी

रुक : गए थे नमाज़ बख़॒श॒वाने रोज़े गले पड़ गए, एक काम से जान छुड़ाते छुड़ाते एक और काम मिल जाये तो कहते हैं

गए विचारे रोज़े रहे, एक कम तीस

तीस में से एक रोज़ा निकल गया, उन्तीस रह गए

गई बू बूदार की और रही खाल की खाल

अपना भिन्न गुण खो कर जैसे थे वैसे ही निकम्मे रह गए, बन बना कर बिगड़ गए

गई चौधराहट फिरी है

गई हुई इज़्ज़त दुबारा मिली है

गई जवानी फिर न बाहो रे लाख मलीदा खाओ

जवानी एक दफ़ा जाकर नहीं आती चाहे कुछ करो

गंग जहाँ रंग

जहाँ गंगा वहीं आनंद

गंगा गए तो गंगा-राम जमना गए तो जमना-दास

अवसरवादी और परिस्थिति के अनुसार अपने तरीक़े बदलने वाले व्यक्ति के बारे में बोलते हैं

गंगा जान हार , भागीरथ के सर पड़ी

जो काम होना होता है हो कर रहता है मगर नाम किसी और का होजाता है

गंगा किस की खुदाई है

उस के संबंंध में कहते हैं जो अपने धन एवं समपत्ति पर घमंड करे या ताक़त एवं बल की बात करे

गंगा मदार का कौन साथ

इजतिमा ज़िद्दीन मुनासिब नहीं होता, दो मुतज़ाद चीज़ें यकजा नहीं होतीं

गंगा मदार का साथ क्या

दो मुतज़ाद चीज़ें यकजा नहीं होतीं

गंजे के एक रग ज़्यादा होती है

गंजा शरीर और चालाक होता है

गँवार गन्ना न दे भेली दे

गंवार सहज में गन्ना नहीं देता, पर धमकाने से गुड़ दे देता है, आसानी से मूर्ख कोई चीज़ नहीं देता।

गँवार गनों का यार

स्वार्थी उद्देश्य का मित्र होता है, गंवार भी अपना उद्देश्य देखता है

गँवार का हाँसा, तोड़ दे पाँसा

बेवक़ूफ़ी का मज़ाक भी हानिकारक होता है; ऐसे व्यक्ति से बहुत अधिक संबंध नहीं रखना चाहिए जिससे नुक़सान पहुँचे

गँवार की 'अक़्ल गुद्दी में होती है

अज्ञानी बिना सज़ा के सीधा नहीं होता

गँवार को गाँठ का दीजे 'अक़्ल न दीजे

गंवार को नक़द दे देना चाहिए नसीहत नहीं करनी चाहिए क्योंकि इस पर इस का कोई असर नहीं होता , गंवार को कुछ दानाई की क़दर नहीं होती

गँवार को गाँठ का दीजिए 'अक़्ल न दीजिए

गंवार को नक़द दे देना चाहिए नसीहत नहीं करनी चाहिए क्योंकि इस पर इस का कोई असर नहीं होता , गंवार को कुछ दानाई की क़दर नहीं होती

गँवर बुध भेड़ चाल

बगै़र सोचे समझे दूसरों की देखा देखी कोई काम करने या अंधा धुंद तक़लीद करने के मौक़ा पर कहते हैं

गाड़ी भर आश्नाई काम की नहीं मगर रत्ती भर नाता काम आता है

ज़रा सी क़राबत बहुत सी दोस्ती पर ग़ालिब होती है, वक़्त पड़ने पर रिश्तेदार ही काम आते हैं, बुरे वक़्त पर अपने ही साथ देते हैं

गाड़ी देख कर पाँव फूलते हैं

ज़रा सहारा पाकर मेहनत से बचने या ख़ुद हिम्मत ना करने और दूसरों के सहारे चलने के मौक़ा पर मुस्तामल

गाड़ी को देख लाड़ी के पाँव फूले

रुक: गाड़ी देख कर पाँव फूलते हैं

गाड़ी राह सो गाड़ी राह

हर बात अपने ढंग से होती है

गाय जब दूब से सुलूक करे क्या खाए

दूसरों का लिहाज़ करने वाला हानि उठाता है

गाए का दूध सो माए का दूध

गाय का दूध माता के दूध के समान होता है

गाय को अपने सींग भारी नहीं

(औरत) अपने परीवार के लोग किसी को बोझ नहीं मालूम पड़ते

गाए न आवे बछवे लाज

माँ को बेटे की शरम नहीं होती अथवा इसका यह अर्थ भी हो सकता है कि माँ को तो लाज नहीं आती परंतु बेटा लज्जित हो रहा है

गाय न हो तो बैल दूहो

कुछ न कुछ धंधा करते रहो

गाएं गायों जमा' गाय का बछिया तले बछिया का गाय तले करना गाय का भैंस तले भैंस का गाय तले करना

गाय के दूध को जो बहुत सारा होता है बछिया का दूध बताना, और बछिया के दूध को जो थो ड़ासा होता है गाय का दूध बताना,रणनीतिक और चतुराई से कुछ करना, बड़ा जोड़-तोड़ करने वाले के लिए उपयोगित

ग़ाइब-दिमाग़

जो खोया खोया रहता हो, भुलक्कड़

गाँड़ लंगोटी नाम फ़त्ह ख़ाँ

मुफ़लसी में शेखी या बड़े बड़े दावे करने वाले की निसबत कहते हैं

गांड़ में लंगोटी, न सर पे टोपी

अत्यन्त ग़रीब है, कुछ पहनने तक को प्रयाप्त नहीं है

गाँड़ फट जाए मगर चूतड़ ना हटे

(फ़हश) कुछ भी हो ज़िद और आन में फ़र्क़ ना आए, कुछ भी हो मुस्तक़िल मिज़ाजी में फ़र्क़ ना आए

गांड न धोए सो ओझा होय

जादूगर नापाक ही रहता है

गाँडू हाथी अपनी फ़ौज को मारता है

(अश्लील) उसे कहा जाता है जो प्रतियोगिता में प्रतिद्वंद्वियों को पीठ दिखा कर भाग जाए और अपने ही साथियों को नुक़सान पहुँचाए

गाँडू का हिमायती भी हारा है

(अश्लील बाज़ारू) कम धैर्य और नपुंसक का पक्षधर भी अपमान उठाता है, बेकार का साथी भी शर्मिंदगी उठाता है, नालायक़ और नीच का साथ देना मूर्खता में शामिल है

गाँठ गिरह में कौड़ी नहें गट्टे वाले होत

जेब ख़ाली है मगर शेखी बघारते हैं, मुफ़लिसी में शौक़ीन मिज़ाजी

गाँठ गिरह में कौड़ी नहीं, बाँकेपुर की सैर

बे रुपय पैसे हौसलामंदी, मुफ़लिसी में शौक़ीन मिज़ाजी

गाँठ जुदा , घर साझला , कुंबा बारह बाँट

अगर एक घर में सब भाई इकट्ठे रहें मगर कमाई जुदा जुदा रखें तो आपस में झगड़े शुरू हो जाते हैं

गाँठ का दे दे, पर बीच में न पड़े

ज़ामिन होना अच्छा नहीं, ज़ामिन बनने से कुछ दे देना बेहतर है

गाँठ का देना और लड़ाई मोल लेना

अपना नुक़सान बर्दाश्त करके झगड़ा मोल लेना

गाँठ का दीदे पर पेच में न पड़े

गारंटर बनना ठीक नहीं नक़द देदे

गाँठ खुले न बहुरिया डेहरस

बुरे पति की पत्नी को तलाक़ न हो तो डूब जाती है

गाँठ में दाम तो सब करें सलाम

पैसा पास हो तो सब इज़्ज़त करते हैं

गाँठ में न गिरह में जौनपुर का भाड़ा

बे रुपय पैसे में हौसलामंदी, मुफ़लिसी में शौक़ीन मिज़ाजी

गाँठ में पैसा नहीं बाँके पोर की सेर

मुफ़लस शौक़ीन की निसबत कहते हैं

गाँठ में पैसा नहीं, पतुरिया को देख रुवाई आए

मुफ़लसी में रंडी बाज़ी मुम्किन नहीं, शादी करने को दिल चाहे मगर पैसा पास नहीं, ऐसे काम की ख़ाहिश करना जिस के वसाइल ना हूँ

गाँठ में पैसा नहीं बांकेपुर की सैर

पास में पैसा न हो परंतु किसी वस्तु को ख़रीदने को मन मचले तब कहते हैं

गाँठ में ज़र है तो नर है , नहीं तो ख़र है

दौलत है तो आदमी सब पर ग़ालिब है वर्ना गधे से बदतर है

गाँठ न मुट्ठी, फड़फड़ाती उट्ठी

पास में पैसा न हो परंतु किसी वस्तु को ख़रीदने को मन करे तब कहते हैं

गाँव और का , नाँव और का

चीज़ किसी की और नाक किसी का, बेगानी चीज़ से अपनी शौहरत

गाँव बसंते भूतले, शहर बसंते देव

गाँव में भुतने बस्ते हैं और शहर में देवता, देहातियों की शरारतों और झगड़ों पर तंज़ है

गाँव बसते भूतना शहर बसते देव

गांव में भुतने बस्ते हैं और शहर में देव, देहातियों की शरारतों और झगड़ों पर तंज़ है गन॒वार लड़ते झगड़ते रहते हैं मगर शहर वाले तहम्मुल से रहते हैं

गाँव भागे पघिया लागे

फ़सल पक्की है और गान॒ो वाले ग़ैर हाज़िर हैं, ज़रूरत के वक़्त कोई मौजूद नहीं , ज़मींदारों की लापरवाई के लिए तंज़न कहते हैं

गाँव डूबा जाए सवाने की लड़ाई

ज़मीन॒दार मामूली झगड़ों में बहुत सा रुपया लगा देते हैं, ज़मींदार फ़ुज़ूल झगड़ों में पड़े रहते हैं और गान॒ो बर्बाद होता है

गाँव गए की बात है

बाहर जाने पर क्या काम लग जाए एवं कब लौटें इस तरह का भाव प्रकट करने के लिए कहावत है

गाँव गया सोता जागे

जिस प्रकार सोए हुए का पता नहीं कब जागेगा उसी प्रकार यात्री के लौटने का कोई पता नहीं होता

गाँव का जोगी जोगना अन गाँव का सिध

वतन में इंसान की क़दर नहीं होती, वतन से बाहर होती है, अपनी चीज़ की क़दर नहीं होती, अपनों की निसबत ग़ैरों की क़दर-ओ-मंजिलत ज़्यादा होती है

गाँव के गँवेरे मुँह में ख़ाक पेट में ढेले रोड़े

देहात के लोग उमूमन ग़रीब होते हैं

गाँव मरा बला से , हाथी तो देखा

ज़रा से नफ़ा या शौक़ के लिए बड़े नुक़्सान की पर्वा नहीं है, ज़रा से नफ़ा के वास्ते बहुत सा नुक़्सान बर्दाश्त करना

गाँव में धोबी का छैल

गाँव में धोबी का लड़का ही उतसुक बना फिरता है, क्योंकि उस का बाप शहर वालों के जो कपड़े धोने लाता है, वह उन्हें पहनता है, जो गाँव वालों को देखने को नहीं मिलते, धोबी का बेटा गाँव में सब से अच्छे कपड़े पहनता है, क्योंकि उस के कपड़े उजले होते हैं

गाँव में घर न जंगल में खेती

कुछ पास नहीं है, बहुत निर्धनता है, निर्धन है

गाँव में पड़ी मरी , अपनी अपनी सब को पड़ी

मुसीबत के वक़्त कोई किसी की मदद नहीं करता, सब को अपनी अपनी पड़ी होती है

गाँव तुम्हारा नाँव हमारा

ख़र्च किसी का शौहरत किसी की

गाओ बजाओ मियाँ के वही नहीं

(ओ) बड़ा पस्तहिम्मत है , लाख कहो सुनो इस पर कुछ असर नहीं होता

गाओ या बजाओ मियाँ मिनकते ही नहीं

कुछ भी कहो सुनो असर ही नहीं होता

गाओ, बजाओ, बन्ने के लोलो ही नहीं

जिसके लिए यह सब धूमधाम है, वही नहीं

गाऊँ न गाऊँ बिरह गाऊँ

अव़्वल तो गांवगा नहीं अगर गांवगा तो हिजर का गीत, अव़्वल तो कोई काम नहीं करता और अगर करता है तो नुक़्सानदेह, इस से जब होगी बेवक़ूफ़ी होगी

गाऊँ न गाऊँ बिरहा गाऊँ

अव़्वल तो गांवगा नहीं अगर गांवगा तो हिजर का गीत, अव़्वल तो कोई काम नहीं करता और अगर करता है तो नुक़्सानदेह, इस से जब होगी बेवक़ूफ़ी होगी

गाऊँ ना गाऊँ बिरहा गाऊँ

अव़्वल तो गांवगा नहीं अगर गांवगा तो हिजर का गीत, अव़्वल तो कोई काम नहीं करता और अगर करता है तो नुक़्सानदेह, इस से जब होगी बेवक़ूफ़ी होगी

गाभनी गाभ डाल देती है

बहुत रोब-ओ-दबदबा है

गाछ में कटहल, होंट में तेल

समय के पहले ही किसी काम की तैयारी करना

गाहक और मौत का पता नहीं कब आ जाए

ग्राहक और मृत्यु किसी समय भी आ सकते हैं इसलिए सदैव तैय्यार रहना चाहिए, दोनों के आने का कोई वक़्त नहीं, किसी वक़्त आ जाएँ, ये दोनों कभी भी आ सकते हैं इनके विषय में कुछ भी निश्चित नहीं

गाजर की पूँगी बजी तो बजी, नहीं तो तोड़ खाई

जो चीज़ कई तरह से काम आ सकती हो अर्थात एक काम न आए गी तो दूसरे काम आ जाए गी

गाजरों में गुठलियाँ मिला दें

अच्छा बना हुआ काम बिगाड़ देना

गाल गालों वाला जीते , माल वाला हारे

ज़बान दराज़ के आगे भले आदमी का ख़ामोश रहना बेहतर है, झूटा आदमी सचों को झटला लेता है

गाल का जीते , गाली का हारे

रुक : गालों वाला जीते माल वाला हारे

गाल में आग एक में पानी

रुक: एक गाल हंसना एक गाल रोना

गाल वाला जीते, माल वाला हारे

बातें बनाने वाला सदैव फ़ायदे में रहता है जबकि माल वाला नुक़सान में, बातूनी के आगे भला मानस चुप रहता है

गाले डूबेंगे , पत्थर तिरेंगे

ये कलजुग के आसार हैं रज़ीलों और कमीनों का कामयाब होना और शरीफ़ों का महरूम और ज़लील ख़ार होना

गाले तिरें , पत्थर तिरें

उल्टा ज़माना है शरीफ़ ख़ार होते हैं और शरीरों की इज़्ज़त है

गाले तिरें पत्थर डूबीं

अच्छे लोग सफल होते हैं और बुरे लोग विफल

गाली और भात खाने के वास्ते हैं

जब कोई सहनशीलता या कायरता के कारण दुर्वचन का जवाब नहीं देता है तो हँसी हँसी में कहा जाता है कि गाली खाने के लिए ही होती है

गाली और तरकारी खाने के वास्ते हैं

दुर्वचन सुनकर क्रोध न करने

गाली देने से गूँगा बोले

बुरी बात की किसी को सहार नहीं होती इस लिए जवाब देने पर मजबूर हो जाता है

गाली दिए से गुंगा बोली

بری بات کی کسی کو سہار نہیں ہوتی

गालों में चावल भरे हैं , चबा चबा के बातें करता है

साहब-ए-मक़दूर है इस लिए ऐसी बातें करता है

गाना और रोना, किस को नहीं आता

मेहनती और काम करने वाले आदमी से ख़ाली नहीं बैठा जाता

गाना न आए आँगन टेढ़ा

रुक : नाच ना जाने आंगन टेढ़ा जो फ़सीह है

गाना न बजाना, पाद पाद के रिझाना

जब किसी व्यक्ति को कोई काम करने का तरीक़ा मा'लूम न हो और वो भद्दी हँसी में वक़्त बिताए तो उस के संबंध में ऐसा बोलते हैं

गाना न सकूँ आँगन टेढ़ा

रुक : नाच ना जानों आंगन टेढ़ा

गाना नहीं आया तो कहे अँगन बनका

रुक : नाच ना जानों आंगन टेढ़ा

गाना उत्तम, बजाना मद्धम

वाद्य यंत्र को ध्वनि से कम रखा जाता है

गाने वाले का मुँह नाचने वाले का पैर नहीं रहता

रुक : गाने वाले का मुंह नहीं रहता

गाने वाले का मुँह नहीं रहता

मेहनती और काम करने वाले आदमी से ख़ाली नहीं बैठा जाता

गाती गाते गाते आदमी 'अताई हो ही जाता है

काम करते करते आदमी तजरबाकार हो जाता है, हर कमाल मश्क़ पर मौक़ूफ़ है

गाती गाते गाते आदमी कलाँवत हो ही जाता है

काम करते करते आदमी तजरबाकार हो जाता है, हर कमाल मश्क़ पर मौक़ूफ़ है

गाती गाते गाते आदमी कलवंत हो ही जाता है

काम करते करते आदमी तजरबाकार हो जाता है, हर कमाल मश्क़ पर मौक़ूफ़ है

गाव आमद ख़र रफ़्त

 गाव आमद-ओ-ख़र रफ़त  दरअसल मशहूर मिसरा  मारा चह अज़ीं क़िस्सा कि गाव आमद-ओ-ख़र रफ़त  का एक जुज़ु है और लाताल्लुक़ी ज़ाहिर करने के मौक़ा पर बोला जाता है

गाव गाह गाह , माही हर माह , बुज़ हर पगाह

तबीबों का क़ौल है कि गाय का गोश्त कभी कभी मछली महीने में एक बार और बिक्री का गोश्त हर रोज़ खाना चाहिए

गाय गोबर खाएगी और बेटी बर माँगेगी

चौधवीं सदी के मुताल्लिक़ कहते हैं कि निहायत ख़राब ज़माना है, निहायत बेशरमी का वक़्त आ गया है

गाय गू खाएगी और बेटी बर माँगेगी

चौधवीं सदी के मुताल्लिक़ कहते हैं कि निहायत ख़राब ज़माना है, निहायत बेशरमी का वक़्त आ गया है

गाय गू खाएगी और कुँवारी बर माँगेगी

चौधवीं सदी के मुताल्लिक़ कहते हैं कि निहायत ख़राब ज़माना है, निहायत बेशरमी का वक़्त आ गया है

गाय जब दूब से दोस्ती करे क्या खाए

दूसरों का लिहाज़ करने वाला नुक़्सान उठाता है

गाय का बछिया तले और बछिया का गाय तले

उधर की चीज़ इधर, उधर की चीज़ उधर, हिकमत-ए-अमली या तदबीर के साथ कोई काम चलाना

गाय का भैंस तले और भैंस का गाय तले

उधर की चीज़ इधर, उधर की चीज़ उधर, हिकमत-ए-अमली या तदबीर के साथ कोई काम चलाना

गाय का लवारा मर गया तो खल्लड़ा वेख पुन्हाई

गाय का बछड़ा मर जाए तो उसकी खाल में भुस भरकर उसे दिखाते हैं तो वह दूध देती है उस मौक़ा पर कहते हैं जब असल चीज़ ख़राब हो जाए, या कोई मर जाए तो उसकी निशानी देख कर याद करें

गाय का लवारा मर गया तो खलड़ा देख पन्हाई

अगर गाय का बच्चा मर जाता है तो इस की खाल में भुस भर कर गाय के पास खड़ा कर देते हैं और वो अपने थनों में दूध उतार देती है , असल ना हो तो नक़ल से काम लिया जाता है

गाय को सींग दूभर नहीं होते

गाय को अपने सींग भारी नहीं होते, इंसान को अपनी अहल-ओ-अयाल बूओझ महसूस नहीं होते

गाय न बच्छी नींद वे अच्छी

जिस के पास कुछ नहीं उसे कुछ फ़िक्र नहीं होती

गबरू जवान , बड़ी आन बान

ख़ूबसूरत और शकील की बड़ी शान और बड़े दिमाग़ होते हैं

गदागर तवाज़ो' कुनद ख़ूए ओस्त

तवाज़ो करना फ़क़ीर की आदत है, फ़क़ीर अगर आजिज़ी या इनकिसारी से काम लेता है तो ये उस की आदत है किसी से डर कर नहीं करता

गधा बरसात में भूका मरे

मूर्ख व्यक्ति अपनी मूर्खता के कारण भूका मरता है, दुर्भाग्यवान व्यक्ति को तब भी कुछ नहीं मिलता है जब हर किसी के पास सब कुछ होता है

गधा धोए से बछरा नहीं होता

कमीना लिबास से शरीफ़ नहीं बिन सकता है, ज़ेबाइश-ओ-आराइश से बुरी चीज़ अच्छी नहीं हो सकती

गधा गधे की पीठ खुजाता है

रुक : गधे को गधा खुजाता है जो फ़सीह है

गधा गया दुम की तलाश में , कटा आया कान

अहमक़ अपने नुक़्सान की तलाफ़ी के लिए कोशिश करता हुआ नुक़्सान कर बैठा

गधा गया तो गया रस्सी भी ले गया

बड़े नुक़्सान की पर्वा नहीं छोटे नुक़्सान का अफ़सोस है , एक नुक़्सान तो हुआ था, उस की वजह से दूसरा भी हुआ, चीज़ भी गई और दूसरा नुक़्सान भी हुआ

गधा गिरे पहाड़ से, मुर्ग़ी के टूटे कान

एक असंबद्ध बात, असंभव बात, न गधा पहाड़ से गिरता है न मुर्ग़ी के कान टूट सकते हैं

गधा खाए खेत , न हरलो के न परलो के

नालायक़ के साथ सुलूक करने से कोई फ़ायदा नहीं होता

गधा खरसा में मोटा होता है

मुर्ख दुख के समय ख़ुश होता है और ख़ुशी में दुखी होता है, मुर्ख निर्धनता में भी दुबला नहीं होता, मूर्खों को बुरी परिस्थितियों की परवाह नहीं होती

गधा क्या जाने ज़ा'फ़रान की क़द्र

नालायक़, अक्षम और बेवक़ूफ़ को अच्छी चीज़ या बहुमूल्य सामान की क़द्र नहीं होती, अज्ञानी शख़्स किसी चीज़ का वास्तविक महत्त्व क्या जाने

गधा मक्के से फिर आवे वो हाजी नहीं हो जाता

ये कहावत शेख़ सादी के इस शेअर का तर्जुमा है : ख़र ईसा अगर ये मक्का रौद जो बयाबद हनूज़ ख़र बाशद

गधा मरे कुम्हार का, धोबन सती हो

नुक़्सान किसी का हो और रंज कोई और उठाए

गधा पानी पिये घंघोल के

गधा भी कूड़ा अलग करके पानी पीता है

गधा पीटे से घोड़ा नहीं होता

मूर्ख को सभ्य बनाने से कोई लाभ नहीं, प्रशिक्षण से तुच्छ व्यक्ति सज्जन और सुशील नहीं बन सकता

गधे घोड़े बराबर

रुक : गधा घोड़ा बराबर

गधे गो दिया नमक, उस ने कहा मेरी आँखें फूटें

रुक : गधे की आँखों में नून दिया अलख

गधे का जीना थोड़े दिन भला

जिसे हर समय परिश्रम करना पड़े, वह मरे के तुल्य है

गधे का खाया पाप में न पुन में

गधे का खाया पाप ना पुण्य

गधे का मास, कुत्ते के दाँत

ये किसी काम नहीं आते

गधे के खाए खेत न हरलू के न परलू के

नालायक़ के साथ सुलूक करने से कोई फ़ायदा नहीं

गधे के मुँह में शहद डालने का क्या फ़ाइदा

अयोग्य को पद देने से कोई लाभ नहीं होता

गधे के सर से सींग

किसी चीज़ का सिरे से ख़त्म हो जाना, ऐसे ग़ायब होना कि कभी थे ही नहीं, बिल्कुल न होना की जगह प्रयुक्त

गधे की आँखों में नून दिया , उस ने कहा मेरी आँखें फोड़ें

नादान के साथ भलाई की इस ने कहा उलटी तकलीफ़ दी, बीवक़ोब के साथ एहसान करना भी बेफ़ाइदा है

गधे की दोस्ती यही है कि लातें मारे

बेवक़ूफ़ की दोस्ती में नुक़्सान होता है

गधे की यारी, लात की सनसनाहट

बेवक़ूफ़ की दोस्ती में बहुत नुक़सान होता है

गधे को अंगूरी बाग़

किसी मनुष्य को ऐसी वस्तु देना जिसके वह योग्य नहीं

गधे को गधा खुजाता है

मूर्ख के साथ एहसान किया उस ने समझा दुर्व्यव्हार हुआ

गधे को नून दिया, उस ने कहा, मेरी आँखें दुखती हैं

रुक : गधे की आँखों में नून दिया अलख

गधे को पूरी हल्वा

रुक : गधे को अंगूरी बाग़, बेवक़ूफ़ को रुतबा

गधे को ज़ा'फ़रान की क़द्र नहीं

रुक : गधा किया जाने ज़ाफ़रान की क़दर

गधे को ज़ा'फ़रान दी, उस ने कहा, मेरी आँख फोड़ी

बुरे के साथ सुलूक करना भी बुराई है

गधों से हल चलें तो बैल काहे को बिसाएँ

अयोग्य व्यक्तियों से यदि काम चले तो योग्य की कौन पूछे

गधों से हल चलें तो बैल क्यूँ बिसाएँ

अगर नादानोन से हुनरमंद वन का काम निकले तो हुनरमंदों को कौन पूछे

गहना पहन कर ढक चले, पूत जन कर नयो चले

अल्लाह ताला दौलत दे तो उसे छुपा कर रखे और औलाद दे तो इन्किसार से काम ले, इतराना किसी हाल में अच्छा नहीं

गहनों में गहना पीतल की नथ

गहने हैं तो वो भी पीतल के और एक नथ; अर्थात: हर चीज़ बिलकुल महत्वहीन और मूल्यरहित; कुल मिलाकर यही है इसलिए यह बेकार है, बहुत ग़रीब हैं

गहरे हो गए

ख़ूब फ़ायदा हुआ

गहरे यार हैं

बहुत दोस्त हैं, दिली या जानी दोस्त हैं

गहरी लाली देख कर फूल गुमान भए, कितने बाग जहान में लग लग सूख गए

अपना गहरा सौंदर्य देखकर फूल को घमंड हो गया परंतु वह यह नहीं जानता कि इस दुनिया में कितने बाग़ लगे और कितने उजड़ गए

ग़ैर का घर थूक का डर

अपनी चीज़ को चाहे जिस तरह बरतें, दूसरे की चीज़ की इख़तियार करनी पड़ती है

ग़ैर का सर कद्दू बराबर

उस समय भी बोलते हैं जब कोई किसी के सर की झूठी सौगंध खाए

ग़ैर के घर शादी मेरे खट-खटा

दूसरे के हाँ ख़ुशी और मेरे घर हंगामा

ग़ैर के लिए कुँवाँ खोदेगा, सो आप ही डूबे गा

जो दूसरे को नुक़्सान पहुंचाने की कोशिश करता है ख़ुद ही नुक़्सान उठाता है

ग़ैर की चोट उठानी मुश्किल

दूसरों का वार सँभालना मुश्किल होता है

ग़ैर की दहलीज़ और रोटी कड़वी

दूसरों के यहां रहना और उन के टुकड़ों पर बसर करना दोनों ही तकलीफ़देह हैं, ग़ैर जगह आराम नहीं मिलता, दूसरे का एहसास उठाना मुश्किल है

ग़ैरत-दार को चुल्लू भर पानी काफ़ी है

जिस शख़्स में ग़ैरत का माद्दा होता है इस के लिए थोड़ी तौहीन भी बहुत है

गला-या-तला

वेश्या अगर व्यभिचार करना शुरू कर दे तो अच्छा गाना नहीं गा सकती

गले पड़ी बजाए सिद्ध

गले में जब ढोलकी पड़ जाए तो फिर उसे बजाना ही चाहिए

ग़ल्ला चूँ अर्ज़ां शवद इम्साल सय्यद मी शवम

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मसतक़ामल) उस शख़्स की नसबक़त बोलते हैं जो मौक़ा बे मौक़ा बदलता रहे

ग़ल्ला गर अर्ज़ां शवद इम्साल सय्यद मी शवम

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मसतक़ामल) उस शख़्स की नसबक़त बोलते हैं जो मौक़ा बे मौक़ा बदलता रहे

ग़म न दारी बुज़ ब-ख़र

फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल, अगर तुझे कोई ग़म नहीं तो बिक्री ख़रीद ले, ख़्वाहमख़्वाह का ऐसा काम अपने सरलीना जो फिक्रो तरद्दुद का बाइस हो, बेकार रंज-ओ-अलम पालना

ग़म न दारी बुज़ ब-ख़र

फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल, अगर तुझे कोई ग़म नहीं तो बिक्री ख़रीद ले, ख़्वाहमख़्वाह का ऐसा काम अपने सरलीना जो फिक्रो तरद्दुद का बाइस हो, बेकार रंज-ओ-अलम पालना

गंदी बोटी का बिसाहिंदा शोरबा

बदों की बद औलाद, बुरे का बुरा नतीजा

गंदी बोटी का गंदा शोरवा

बदों की बद औलाद, बुरे का बुरा नतीजा

गंदी बोटी का गंदा शुरवा

बदों की बद औलाद, बुरे का बुरा नतीजा

गंदुम अगर बहम न-रसद भुस ग़नीमत अस्त

बड़ा फ़ायदा हासिल ना हो तो थोड़ा फ़ायदा ही सही, अच्छी चीज़ मयस्सर ना हो तो मामूली चीज़ ही ग़नीमत है, असल चीज़ हासिल ना कर किसे तो खिसयाना हो कर किसी और चीज़ पर इकतिफ़ा कर लेने के मौक़ा पर बोलते हैं

गंदुम अगर बहम न-रसद जौ ग़नीमत अस्त

बड़ा फ़ायदा हासिल ना हो तो थोड़ा फ़ायदा ही सही, अच्छी चीज़ मयस्सर ना हो तो मामूली चीज़ ही ग़नीमत है, असल चीज़ हासिल ना कर किसे तो खिसयाना हो कर किसी और चीज़ पर इकतिफ़ा कर लेने के मौक़ा पर बोलते हैं

गंगा भी जाए कलवारन छाती पीटे

कलवारों पर तंज़ है कि इतना पानी ज़ाए होरहा है काश वो शराब में मिला कर बेचती , किसी को फ़ायदा हो तो बख़ील को दुख होता है , लालची हर चीज़ ख़ुद लेना चाहा है

गंगा भी जाए कलवावल छाती पीटे

कलवारों पर तंज़ है कि इतना पानी ज़ाए होरहा है काश वो शराब में मिला कर बेचती , किसी को फ़ायदा हो तो बख़ील को दुख होता है , लालची हर चीज़ ख़ुद लेना चाहा है

गंगा के मेले में चक्की को कौन पूछे

बड़े लोगों के मजमा में अदना की कौन सुनता है , बेमहल और बे मौक़ा काम की क़दर नहीं होती

गंगा के मेले में चक्की रहे का क्या काम

बड़े लोगों के मजमा में अदना की कौन सुनता है , बेमहल और बे मौक़ा काम की क़दर नहीं होती

गंगा को आना था भागीरत के सर जस हुआ

एक बात होने वाली थी मगर नामवरी क़िस्मत ने मुफ़्त में और को दे दी, मुफ़्त की नामवरी के मौक़ा पर बोलते हैं

गंगा नहाए फल होए तो मेंडक मछलियाँ तिर जाएँ

अगर गंगा में नहाने से नजात हो तो मीनडख़ और मछलीयों की होनी चाहिए जो इसी में रहते हैं, महिज़ रस्मों से कुछ नहीं होता जब तक आमाल दरुस्त ना हूँ

गंजा मरा खुजाते खुजाते

निर्धन आदमी अपना पूरा जीवन दुख में बिता देता है

गंजे को ख़ुदा नाख़ुन नहीं देता

नाअहल को ख़ुदा बाइख़तियार नहीं करता

गंजिफ़े के तीनों खिलाड़ी रोते हैं

गंजिफ़े का हर एक खिलाड़ी नुक़्सान में रहता है, हर एक शिकायत करता है कि उस के पत्ते अच्छे नहीं

गंजी कोंजड़ी और गोखरू का एंडवा

कोई अपनी हक़ीक़त और हैसियत से बढ़ कर काम करे तो कहते हैं

गर न सितानी ब सितम मी रसद

(फ़ारसी कहावत अदबीयात में मुस्तामल) जब बगै़र ख़ाहिश के चीज़ मिल जाये तो ऐसे मौक़ा पर कहते हैं

गर ज़रूरत बुवद रवा बाशद

ज़रूरत के वक़्त सब कुछ जायज़ रवा है

गराँ ब-हिकमत, अर्ज़ां ब-'इल्लत

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) जो चीज़ बेशक़ीमत हो अच्छी होती है और जोशे कम क़ीमत हो या अर्ज़ां हो इस में ख़राबी होती है

गरजते हैं सो बरस्ते नहीं

शोर करने वाला कोई काम नहीं करसकता, शेखी बाज़ों की बातें ही बातें हुआ करती हैं, लाफ ज़न कुछ नहीं कर सकता, जो डींगें मारते हैं वो करते कुछ नहीं

ग़रज़ बावली होती है

ज़रूरतमंद आदमी पागल होता है, वह अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए कुछ भी करने से नहीं हिचकिचाता, इच्छुक को बस अपना काम सूझता है, अर्थात आवश्यकता उसे अंधा बना देती है

ग़रज़ का बावला अपनी गावे

आकांक्षी व्यक्ति अपनी ही बात की धुन रखता है, हर समय अपनी आवश्यकता एवं ज़रूरत बयान करता रहता है

ग़रज़ के लिए गधे को बाप बनाना पड़ता है

ज़रूरतमंद को मतलबी की भी ख़ुशामद करनी पड़ती है, ज़रूरतमंद को अपमानजनक काम करना पड़ता है

ग़रज़ मंद करे या दर्द मंद करे

समय पर सहानुभूति या तो वह दिखाता है जो ख़ुद मुश्किल में फँसा हो या जिसको ग़रज़ हो

ग़रज़ निकली आँख बदली

मतलबी बे मर वित्त होता है, तोता चश्मी का इज़हार करते वक़्त कहते हैं

गर्भ का सर नीचा

घमंडी का सर नीचा, अहंकार का अंत अपमान है, अहंकार करने वाला अंत में अपमानित होता है

गर्भ करते रावन हारे

अहंकारी व्यक्ति अंततः अपमानित होता है, ग़ुरूर करने वाला आख़िर में ज़लील होता है

गर्दन मारो और गिरेबान में मुँह डालो

किसी का नुक़्सान कर के चापलूसी करने और नेक बिन कर लोगों को लौटने वाले की निसबत कहते हैं

गर्दन वहाँ मारे जहाँ पानी न मिले

थोड़ा भी दया के क़ाबिल, योग्य नहीं है, अत्याचारी दुष्ट और भ्रष्ट आदमी के संबंध में कहते हैं

गर्दूं की तस्बीह बिल्ली हज को चली

अत्याचारी की धर्मपरायणता से भी क्रूरता का पता चलता है

गर्दूं पे थूका उसी पर पड़ता है

बेगुनाह पर बोहतान लगाने वाला ख़ुद रुसवा होता है

ग़रीब की जवानी, गर्मी की धूप, जाड़े की चाँदनी अकारत जाए

इन चीजों का लाभ कोई नहीं उठाता, बेकार जाती हैं

ग़रीब की जोरू सब की भाबी, ज़बर्दस्त की जोरू सब की दादी

ग़रीब की चीज़ को हर कोई हथियाने की कोशिश करता है, ग़रीब की चीज़ पर हर कोई दावा करना शुरू कर देता है

ग़रीब की जोरू 'उम्दा ख़ानम नाम

यह नाम बड़े आदमियों अर्थात अमीर लोगों की औरतों का होता है

ग़रीब को कौड़ी अशरफ़ी है

ग़रीब बहुत थोड़ी चीज़ से राज़ी या ख़ुश हो जाता है

ग़रीब को मारा तो नौ मन चर्बी निकली

कोई धनवान होने के बावजूद अपने आप को निर्धन दर्शाए तो कहते हैं

ग़रीब ने रोज़े रखे दिन बड़े हो गए

असमर्थ व्यक्ति जो काम करता है उसमें हानि ही होती है या मुसीबत में और मुसीबत घेरती है

ग़रीब तेरे तीन नाम , झूटा , पाजी , बे-ईमान

ग़रीब को लोग हक़ारत से याद करते हैं , ग़रीब की हमेशा हर तरह की बे इज़्ज़ती होती है

ग़रीबी हलीमी , 'अद्ल बादशाही

अजुज़ और इन्किसार का बड़ा दर्जा है

ग़रीबों ने रोज़े रखे, दिन बड़े हो गए

अभागा व्यक्ति अगर कोई काम करने लगे तो उस में और मुश्किलें पैदा हो जाती हैं

गरजा सो बरसा क्या

रुक : जो गरजते हैं वो बरसते नहीं

गर्म पानी से घर नहीं जलता

फ़ुज़ूल बातों से डरना नहीं चाहिए

गर्मी सब्ज़ा रंगों से और घर में भूनी भंग नहीं

पास में पैसा नहीं और सुंदर 'औरतों पर मन मचले

गर्मियों में कश्मीर जन्नत है

कश्मीर में अधिक गर्मी के मौसम में भी सर्दी होती है

गठिया खुला बिटिया पारस

पुत्रवती होने पर ही स्त्री का सम्मान होता है

गठरी बँधी धूल की रही पवन से फूल गाँठ जतन की खुल गई रही धूल की धूल

इंसान की तरफ़ इशारा है कि इंसान मिट्टी की गठड़ी है, जिस में हुआ भरी हुई है, जब ये हुआ निकल जाती है तो फिर मिट्टी ही रह जाती है, इंसान बहुत नापायदार है

गठरी बँधी धूल की रही पवन से फूल गाँठ जतन की खुल गई रही धूल की धूल

इंसान की तरफ़ इशारा है कि इंसान मिट्टी की गठड़ी है, जिस में हुआ भरी हुई है, जब ये हुआ निकल जाती है तो फिर मिट्टी ही रह जाती है, इंसान बहुत नापायदार है

गठरी बांधी धूल की रही पवन से फूल, गाँठ जतन की खुल गई अंत धूल की धूल

मनुष्य मिट्टी की गठरी है जिस में हवा भरी हुई है, जब ये हवा निकल जाती है तो फिर मिट्टी ही मिट्टी रह जाती है

गठरी हलाल बुक़्चा हराम

मामूली मसले में रास्त बाज़ी और अहम मसले में बेईमानी, थोड़ी चीज़ में रास्त बाज़ी, बड़ी चीज़ में बेईमानी

गौने आई बरात बहू को लगी हगास

अगर ठीक समय तैयारी न हो तो कहते हैं अर्थात शिकार के समय कुतिया हगासी

गौरा रुठेगी तो अपना सुहाग लेगी, भाग तो न लेगी

मालिक या आश्रयदाता अप्रसन्न होगा तो अपनी नौकरी से निकाल देगा, भाग्य तो नहीं ले लेगा, भाग्य का तो मिल ही जाएगा

गवाह चुस्त, मुद्द'ई सुस्त

उस अवसर पर बोलते हैं जब स्व-इच्छुक व्यक्ति सुस्त होता है और उसके आस-पास के लोग उसका समर्थन करते हैं और और भरपूर कोशिश करते हैं

गवाले की दही महतो की भेंट

काम किसी का ता'रीफ़ किसी की, ग़रीब की चीज़ बड़े हड़पते हैं

गवार खाए गँवार

आदमी की ख़ुराक उस की हैसियत के मुताबिक़ होती है

गया गाँव जहाँ ठाकुर हँसा, गया रुख जहाँ बगुला बसा, गया ताल जहाँ पकी काई, गई कूप जहाँ भई अथाई

जिस गाँव के मालिक ने भोग में जीवन व्यतीत किया वो उजड़ गया, जिस पेड़ पर बगुले का बसेरा हो वो सूख जाता है, जिस ताल या हौज़ में काई लग जाए एवं जिस कुएँ की तह बैठ जाए वो व्यर्थ एवं बेकार हो जाते हैं

गया है साँप निकल अब लकीर पीटा कर

मौक़ा निकल गया अब पछताने से कुछ हासिल नहीं

गया मर्द जन खाई खटाई, गई राँड जन खाई मिठाई

खटाई खाने से मर्द नामर्द अर्थात कमज़ोर हो जाता है और मिठाई खाने वाली 'औरत बदचलन हो जाती है या बहकाये में आ सकती है

गया सो गया, रहा सो रहा

जो बर्बाद हो गया वह हो चुका, जो बचा है उसे अच्छा समझो

गया वक़्त फिर हाथ आता नहीं

(प्रसिद्ध कवि मीर हसन की कविता का एक श्लोक कहावत के रूप में प्रयोग किया जाता है) जो मौक़ा हाथ से निकल जाये वो फिर हाथ नहीं आता, पछतावा और अफ़सोस रह जाता है

गज़ भर हँसिया न निगलते बने न उगलते

जब किसी काम के करने में भी नुक़्सान, न करने में भी नुक़्सान हो तो कहते हैं

गज़ दो फ़ाख़्ता

एक तीर से दो निशाने, एक तीर से दो शिकार, एक काम से दो फ़ायदे (एक इक़दाम से दो मक़सद पूरे होने के मौक़ा पर मुस्तामल)

गेंडे की ढाल और बिजली की तलवार

दोनों बहुत अच्छी होती हैं, सर्वोत्तम होती हैं

गेहूँ भी गीले , जाँगर भी ढीले

काम भी मुश्किल और कोशिश भी पूरी तरह नहीं तो फिर मक़सद कैसे हासिल हो

गेहूँ दे कर गाजरें खाएँ

(किसी ज़रूरत से) उम्दा चीज़ दे कर अदना चीज़ (बदले में) लेना बेवक़ूफ़ी है

गेहूँ दीगर गाजर खाएँ

अच्छी चीज़ देकर बेकार लेना मूर्खता है

गेहूँ के खेत में करंजुवा उगा

अच्छ्াे की औलाद बुरी होती है, भलाई जय बजाय बुराई पल्ले पड़ी

गेहूँ की बाल नहीं देखी

अभी अनुभवहीन और अनाड़ी है, घर से बाहर भी नहीं निकले

गेहूँ की हज़्म नहीं होती

दौलत या किसी प्रकार की तरक़्क़ी हो जाने पर स्वभाव का बदल जाना

गेहूँ की रोटी को फ़ौलाद का पेट चाहिए

नेअमत खा कर बचाने को बड़ा हौसला चाहिए, दौलत या मर्तबा पाने के बाद अपनी हद से ना बढ़ना पड़े हौसलामंद आदमी का काम है

गेहूँ की रोटी को फ़ौलादी पेट चाहिए

नेअमत खा कर बचाने को बड़ा हौसला चाहिए, दौलत या मर्तबा पाने के बाद अपनी हद से ना बढ़ना पड़े हौसलामंद आदमी का काम है

घड़ा हर बार सालिम नहीं निकलता

कोशिश हर बार कामयाब नहीं होती, नाकाम भी होजाती है

घड़े कुम्हार, बरते संसार

साधारण व्यक्ति के काम से सारी दुनिया फ़ायदा उठाती है, एक आदमी काम करता है और बहुत से लोग फ़ायदा उठाते हैं

घड़े से घड़ा नहीं भरा जाता

ऋण पर ऋण नहीं मिलता, ऋण लेकर ऋण नहीं चुकाया जाता

घड़ी भर में घर जले और अढ़ाई घड़ी में भदार

एक आफ़त ने तो काम तमाम कर दिया अब आइन्दा की आफ़तों को कौन झील सकेगा

घड़ी भर में घर जले और ढाई घड़ी में भदार

एक आफ़त ने तो काम तमाम कर दिया अब आइन्दा की आफ़तों को कौन झील सकेगा

घड़ी दो में मुरलिया बाजे

थोड़ी देर में रंग दगरगों हो जाएगा, असलीयत सामने आजाएगी

घड़ी की बे हयाई सारे दिन का अद्धार

थोड़ी सी बेमुरव्वती बहुत से नुक़्सान से बचाती है

घड़ी में गाँव जले नौ घड़ी का भद्रा

ज्योतिषियों पर व्यंग है कि एक आफ़त ने तो काम कर दिया अब भविष्य की आफ़तों को कौन झेल सकेगा या किस तरह झेला जाएगा

घड़ी में घड़ियाल है

पल भर में कुछ से कुछ हो जाता है, समय का हाल बदलते देर नहीं लगती; मर जाने में देर नहीं लगती

घड़ी में कुछ घड़ी में कुछ

जिसका चित्त स्थिर न हो और छोटी सी बात पर प्रसन्न और छोटी सी बात पर अप्रसन्न हो जाए, घड़ी में तौला घड़ी में माशा, पल में तौला पल में माशा, कभी कुछ और कभी कुछ

घड़ी में माशा घड़ी में तोला

रुक : घड़ी में तौला घड़ी में माशा

घाई की मेरी, तवे की तेरी

तवे की रोटी तेरी बर्तन की मेरी अर्थात अपना ही मतलब देखना

घाईं-घाईं तोरा मुंहा बाजे मोरा

औरत अपने पति की दोस्त से कहती है कि वह खुलेआम मेरा है, छुप कर उसने उससे दोस्ती कर लिया तो क्या हुआ

घाइल की गत घाइल जाने और न जाने कोई

जिस पर बीतती है, वही जानता है

घाँटी तले माँटी

मालिक हर वक़्त काम करवाता है, गले से नीचे खाने का कोई मज़ा नहीं होता

घास के गट्ठे में सूई का ढूँडना

व्यर्थ परिश्रम करना, बेकार प्रयत्न करना असंभव कार्य है, कठिन है

घास खाए दिन कटे तो सब कोई खाए

यदि रूखी सुखी खाने से बहुत हो जाए तो कोई परिश्रम सहन नहीं करेगा, यदि छोटी-छोटी बेकार बातों /वस्तुओं से जीवन आराम से व्यतीत हो जाए तो सभी लोग आराम से रहें

घास खाओ

जब कोई गाहक बहुत सस्ती चीज़ माँगे, तो दुकानदार उसके जवाब में कहता है, मतलब यह होता है कि तो इसकी क़द्र क्या जाने

घायल की गत घायल जाने

मुसीबतज़दा का हाल मुसीबतज़दा ही जानता है

घबराए डोमनी फिर फिर सेहरे गाए

घबराहट में मौक़ा बे मौक़ा कुछ नहीं सूझता

घबराई डोमनी फिर सुहेले गाए

घबराहट में अक़ल ठिकाने नहीं रहती यानी जब डोमनी गाते गाते या बैल लेते लेते घबरा जाती है तो हर फिर कर एक ही गीत गाने लगती है और उसे ये भी ख़बर नहीं होती कि अभी तो में इस गीत कोगा चुकी हूँ

घप घोड़ा, रूठा चाकर, इन का ए'तिबार नहीं

घोड़ा जो सधा हुआ न हो और नौकर जो नाराज़ हो नुक़्सान पहुँचाते हैं, अंधे घोड़े और नाराज़ नौकर का कोई एतिबार नहीं है इन से नुक़्सान हो सकता है

घर आए बेरी को भी न मारिए

जो व्यक्ति घर पर आ जाए उस के साथ बुरा व्यवहार नहीं करते, भले ही वह शत्रु क्यों न हो

घर आए कुत्ते को भी नहीं निकालते

अगर अपने घर कोई सबसे नीच से भी नीच और घृणित से भी घृणित व्यक्ति भी आए तो उसका भी आदर-सत्कार किया जाता है

घर आए नाग न पूजे बानी पूजन जाए

घर आई दौलत छोड़कर दूसरी जगह तलाश में जाना, वर्तमान लाभ को छोड़कर लापता लाभ की आशा पर जाना

घर आए पीर न पूजे बाहर पूजन जा

क़ाबू के वक़्त काम न करे फिर योजना बनाता फिरे, समय पर काम न करना फिर योजना करते फिरना, घर आई दौलत को छोड़कर दूसरी जगह तलाश करना

घर आई कुतिया को भी नहीं निकालते

रुक : घर आए कुते को भी अलख

घर आया ना पूजिये बम्मी पूजन जा

जो मौजूद हो उस को खोकर फिर उस की तलाश

घर बैठे आधा भला

घर की आधी भली, घर बैठ कर आराम से होने वाली थोड़ी आय भी अच्छी है

घर बैठे ख़िज़्र मिले

दिल की कामना पूरी हुई, जिसकी खोज थी मिल गया

घर बयाना दिया

(तंज़िया) मुनासिब और मौज़ून शख़्स से मुआमला नहीं किया

घर भाड़े भाट भाड़े पूँजी को लगे बियाज, मुनीम बैठा रोटियाँ झाड़े दिवाला काढ़े काईं लाज

घर भी किराए पर दूकान भी किराए पर पूँजी पर ब्याज चढ़ रहा है मुनीम मुफ़्त की तनख़्वाह पा रहा है तब दिवाला निकालने में शर्म किस बात की

घर भी बैठो, और जान भी खाओ

निख़ट्टू व्यक्ति घर में रह कर घर वालों को तंग करता रहता है

घर बियाह और बहू पपलियों

सख़्त बदइंतिज़ामी है , बे मौक़ा की ख़ुशी के वक़्त मुस्तामल या जब माँबाप चयन करें और औलाद मुसीबत भुगते उस वक़्त बोलते हैं

घर छोड़ ख़तीरा क़ाइम

घर छोड़ घूरे पर रहना, मूर्ख के लिए कहा जाता है

घर छोटा सम्धियाना बड़ा

हैसियत कम शहरत ज़्यादा

घर दूर भरोटा भारी

घर दूर है और बोझ बहुत है, अधिक मुश्किल या बड़ी मुसीबत के वक़्त बोलते हैं

घर घर का एक ही लेखा

सब का एक ही हाल है

घर घर का, साथ नर का

घर अपना उत्तम है और दोस्त बहादुर आदमी होना चाहिए

घर घर के जाले बुहारती फरती हैं

जो बहुत बार घर बदले या जो औरत एक जगह ठहर न सके, इधर उधर मारी मारी फिरती रहे

घर घर मटियाले चूल्हे हैं

कोई आसूदा हाल नहीं सब एक जैसी हालत में हैं

घर घर पीत न कीजिए तो गाँव गाँव तो कीजिए

अगर बहुत लोगों से दोस्ती नहीं होसकती तो चंद आदमीयों से ही सही

घर घोड़ा, नख़्ख़ास मोल

(लखनऊ) घोड़ा तो घर पर है और बाज़ार (नख़्ख़ास) उसका मोल करते हैं, वस्तु तो घर में है, बिना माल दिखाए ही उसका दाम कहने पर कहते हैं

घर ही में बैद, मरे कैसे?

जब व्यवस्था हो सकती थी तो नुक़्सान कैसे हुआ

घर 'ईद तो बाहर भी 'ईद

घर में आराम मिले, मन प्रसन्न हो तो हर चीज़ अच्छी लगती है

घर जल गया तब चूड़ियाँ पूछीं

शेखी बघारने वाले के प्रति कहते हैं कि अपनी प्रशंसा कराने के लिए अपना नुक़सान कर बैठा

घर जले घूर बता दे

घर तो जल रहा है और कहता है कि धुआँ है, अपने आपको या दूसरे को धोखे में रखना

घर जले गुंडा तापे

नुक़सान किसी का हो और फ़ायदा कोई और उठाए

घर जले तो जले पर चाल न बिगड़े

हानि हो तो हो परंतु पहनावे में अंतर न आए

घर का आटा कौन गीला करे

घर की चीज़ कौन बिगाड़े, अपनी गाँठ से कौन ख़र्च करे

घर का और दिल का भेद हर एक के सामने न कहें

अपने दिल और घर की बात हर एक से नहीं कहनी चाहिए, गोपनीयता से काम लेना चाहिए

घर का भेदी लंका ढाए

राज़दार या भेद जानने वाले की शत्रुता अति घातक होती है, उस समय कहते हैं जब कोई राज़दार मुसीबत खड़ी कर दे, रामायण की घटना की ओर संकेत है जिस में रावण ने राम को रावण को हराने का भेद बता दिया था

घर का जोगी जोगड़ा

रुक: घर का जोगी जोगना, अलख

घर का जोगी जोगना, बाहर का जोगी सिद्ध

मनुष्य को अपने मातृभूमि में महत्व नहीं दिया जाता है, इंसान की वतन में क़दर नहीं होती, अपने गाँव में फ़क़ीर होता है दूसरे गाँव में औलिया समझा जाता है

घर का परसय्या अंधेरी रात

अपनों की मुदारात अपनों में, अपना आदमी देने वाला हो तो ख़ूब रहता है

घर काज बहू गेलावन को

महिला का घर के काम काज से जी चुराना, समय पर गुम हो जाना

घर कर घर सत्तर बला सर धर

घर-गृहस्थी एक जंजाल है

घर के ही न घेरते

किसी लायक़ होते तो अपना ही काम/नाम ना सँभालते

घर के जले बन गए बन में लागी आग, बन बिचारा क्या करे जो कर्मों लागी आग

बहुत प्रयत्न करने पर भी जब कोई आदमी सफल-मनोरथ नहीं होता तब कहते हैं

घर के खीर खाएँ और देवता भला मनाएँ

नेकी वो है जिस से दूसरों को फ़ायदा पहुँचिए, औरों के नाम से अपना काम निकालना या औरों पर एहसान धर के अपना मक़सद हासिल करना

घर के पीरों को तेल का मलीदा

अपनों को अप्रतिष्ठित या असम्मानित और दुसरों का सम्मान करना, हक़दारों के साथ अच्छा व्यवहार न करना और दूसरों की आवभगत करना

घर के रोवें बाहर के खाएँ, दु'आ देते क़लंदर जाएँ

घर वालों से बुरा व्यवहार और बाहर वालों से अच्छा व्यवहार

घर के टके बासी साग

डींगें मारने वाले या शेख़ी बघारने वाले के लिए प्रयुक्त

घर खीर तो बाहर भी खीर

धन धान्य से परिपूर्ण व्यक्ति का बाहर भी सम्मान होता है

घर खोदे ईंधन बहुत

कोई घर को बर्बाद करने पर ही उतारू हो तो उसके लिए ख़र्च की क्या कमी

घर खोज मिटे

नष्ट हो, तबाह हो, बर्बाद हो

घर की आधी न बाहर की सारी

घर में आधी रोटी खानी परदेस में जाकर सारी खाने से बेहतर है

घर की बला घर ही में

घर की मुसीबत घर में ही रही, घर की वस्तु घर ही में रहनी चाहिए

घर की बीबी हाँडनी घर कुत्तों का जोग

आशय है कि जो व्यक्ति अपने घर की देख-भाल नहीं करता उसके घर की दशा ख़राब हो जाती है

घर की बीवी बाँडनी घर कुत्तो जोगा

जब घर की मालिका इधर उधर फिरेगी और घर में ना बैठेगी तो घर में कुत्ते ही लौटेंगे

घर की बीवी हाँडनी घर कुत्तो जोगा

जब घर की मालिका इधर उधर फिरेगी और घर में ना बैठेगी तो घर में कुत्ते ही लौटेंगे

घर की बीवी साग बराबर

रुक : घर की मुर्ग़ी दाल बराबर

घर की बिल्ली और घर ही में शिकार

घरेलू एवं आपसी झगड़ों अथवा विवादों के समय प्रयुक्त

घर की जली बन गई बन में लागी आग बन बेचारा क्या करे कर्मों लागी आग

बदनसीब का कहीं ठिकाना नहीं जहां जाएगा बदक़िस्मती की वजह से सख़्ती उठाएगा

घर की जोरू की चौकसी कहाँ तक

अपने ही घर में रहने वाले व्यक्ति की रखवाली करना बहुत कठिन है, घर के चोर की रखवाली बहुत कठिन है

घर की खाँड किर्किरी, चोरी का गुड़ मीठा

घर की मूल्यवान वस्तु की तुलना में निशुल्क वस्तु अधिक अच्छी लगती है

घर की मरी और मरा साग

रुक : घर की पटकी बासी साग

घर की मुर्ग़ी दाल बराबर

घर की सब से अच्छी वस्तु का घर में ही मूल्य नहीं, आसानी से मिलने वाली वस्तु का कोई मूल्य नहीं, जो कुछ अपने पास है उस का महत्व नहीं होता

घर की मूँछें ही मूँछें हैं

कंगाल आदमी के संबंध में कहते हैं अर्थात घर में कुछ नहीं है

घर की पुटकी बासी साग

घर में देखो तो मिट्टी के बर्तन और बासी साग के सिवा कुछ न निकलेगा बाहर केवल शेख़ी ही शेख़ी है

घर की सोभा घर वाले के संग

घर की शोभा घर वाले से होती है, पत्नी के साथ घर की शोभा होती है

घर की सोभा घर वाले से

घर की शोभा घर में रहने वाले से होती है

घर की सोभा घर वाली के संग

घर की शोभा घर वाले से होती है, पत्नी के साथ ही घर की शोभा होती है

घर मटका तो बाहर मचिया

ग़रीबी और निर्धनता है

घर में आई जो टेढ़ी पगड़ सीधी हो

ब्याह करने से सारी शेखी जाती रहती है

घर में आई जोए, टेढ़ी पगड़ी सीधी होए

टेढ़ी पगड़ी ग़ुंडे ही बाँधते हैं, इसलिए कहावत का यह अर्थ भी हो सकता है कि गृहस्थ बन जाने पर आदमी का आदर बढ़ जाता है

घर में आई तो बाँकी पगड़ी सीधी हुई

जब बीवी घर में आई तो सब ईंठ निकल गई

घर में अनाज नहीं मुल्क का करें राज

पास कुछ नहीं, बड़ाई बहुत

घर में भैरवीं नाच रहा है

घर सोओना पड़ा है

घर में बीबी लक्खो औतार बाहर मियाँ थाना-दार

घर में बीवी अवतार (वली) बिन के मूसें बाहर मियां हुकूमत जता कर लौटें , बीवी फ़क़ीरनी बनी बैठी है, मियां शेखी में थानादार बने फिरते हैं

घर में बिलौती बाघ

घर में सब शेर हो जाते हैं

घर में चने का चून नहीं, गेहूँ की दो पो लाइयो

ग़रीब बड़बोले के संबंध में कहते हैं

घर में चिराग़ नहीं बाहर मश'अल

झूठी तड़क भड़क दिखाना

घर में चूहे डंड करते हैं

इस क़दर मुफ़लसी है कि घर के चूहे तक भूक से बेताब हैं, यानी बहुत ही मुफ़लिस है

घर में चूहे लोटते हैं

इस क़दर मुफ़लसी है कि घर के चूहे तक भूक से बेताब हैं, यानी बहुत ही मुफ़लिस है

घर में चूहे क़लाबाज़ियाँ खाते हैं

ऐसी निर्धनता है कि घर के चूहे तक भूक से छटपटा रहे हैं अर्थात बहुत ही ग़रीब है

घर में दान न पान, बीबी को बड़ा गुमान

ग़रीब होते हुए भी घमंड करना

घर में दवा, हाए हम मरे

घर में वस्तु होते हुए भी उस के लिए इधर उधर भटकना

घर में देखो छलनी न छाज, बाहर मियाँ तीर अंदाज़

झूठी शान दिखाने वाले पर व्यंग्य है

घर में धान न पान बेटी को बड़ा गुमान

۔मिसल (ओ) मुफ़लिसी में ग़रूर करने और शेखी बघारने वाली की निसबत बलवती हैं

घर में दिया तो मस्जिद में दिया

पहले घर में दिया जलाया जाता है उस के बा'द मस्जिद में

घर में घर अच्छा नहीं होता

घर के अंदर दूसरा घर बनाना हानिकारक होता है, घर में घर होने से लड़ाई झगड़े की संभावना अधिक होती है

घर में घर, लड़ाई का डर

पास पास रहने से लड़ाई का भय रहता है

घर में गुड़ बाहर शकर

घर वालों की तुलना में बाहर वालों से बेहतर व्यवहार करना

घर में हल न बलाया, ये माँगे ईख हलाया

मुफ़लिसी में बड़ी बड़ी ख्वाहिशें करना

घर में हल न बल्दिया माँगे एक हल्दिया

ग़रीब शेख़ी बघारने वाले के बारे में कहते हैं

घर में जो शहद मिले तो काहे बन को जाएँ

अगर बगै़र मेहनत मशक्कत के रोज़ी मिले तो दौड़ धूप की ज़रूरत क्यों पड़े

घर में जोरू का नाम बहू बेगम रख लेने से क्या होता है

अपनी प्रशंसा अपने मुँह से करने से कोई लाभ नहीं होता

घर में खाने को नहीं, अटारी पर धुवाँ

शेख़ी करने वाले के संबंध में कहते हैं, घर में खाने को नहीं, फिर भी अटारी पर धुआँ कर रहे हैं, जिस से कोई समझे कि भोजन बन रहा है

घर में ख़र्च न डेवढ़ी पर नाच

मुफ़लसी में शेखी मारना

घर में नहीं अनाज, मुल्क का करें राज

निर्धनता में भी बड़ी बड़ी इच्छाएँ करना

घर में नहीं बूर, बेटा माँगे मोती चूर

बच्चा अपने बाप के सामर्थ से अधिक कुछ माँगे तो कहते हैं

घर में नहीं दाने अम्माँ चलीं भुनाने

ग़रीबी में भोग-विलास सूझता है

घर में नहीं कौड़ी गट्टे वाले होत

ग़रीब शेखी बघारने वालों के बारे में कहते हैं

घर में नहीं तागा, अलबेला माँगे पागा

निर्धनता में बड़ी बड़ी इच्छाएं रखना, चाहे पिता निर्धन हो परंतु पुत्र को छैला बनना अनिवार्य है

घर में पकें चूहे और बाहर कहें पाए

मुफ़लस शेखी बाज़ के मुताल्लिक़ कहते हैं, घर में कुछ नहीं है मगर शेखी मारता है

घर में रहे न तीरथ गए , मूँड मुंडा कर जोगी भए

जीवन का कोई ध्येय पूरा न कर पाना, एक काम छोड़कर दूसरा करना परंतु उसमें भी असफल रहना

घर में शेर बाहर भेड़

इस व्यक्ति के बारे में कहते हैं जो घर वालों पर तो धाक जमाए और रोब दिखाए, लेकिन बाहर वालों से दब जाए, घर वालों पर अकारण ही सख़्ती करने और बाहरवालों से कोमल आचरण रखने वाला

घर में सूत न कपास जुलाहे से लट्ठम लट्ठा

उसके मुताल्लिक़ कहते हैं जो ख़्वाह मख़्वाह लोगों से झगड़ा करे

घर मिलता है तो बर नहीं मिलता, बर मिलता है तो घर नहीं मिलता

बेटियों के लिए अच्छा रिश्ता न मिलने पर कहती हैं अर्थात अमीर है तो लड़का अच्छा नहीं, लड़का अच्छा है तो ग़रीबी है

घर न बार मियाँ महल्ले-दार

डींगें हाँकने या शेख़ी बघारने वाले के लिए प्रयुक्त

घर न दरवा रोए ढाढ़ी जरा

जिस का कोई घर बार नहीं होता वो बदक़िस्मत है

घर न घाट

कोई ठिकाना नहीं

घर न होना

आपस में निबाह होना, पारिवारिक व्यवस्था न होना, ख़ानादारी का इंतिज़ाम ना होना

घर नहीं दाने मियाँ चले भुनाने

मुफ़लिस शेखी बाज़ के मुताल्लिक़ कहते हैं

घर निकाला मिलना

घर से निकाला जाना

घर फूँक कर बिर्रा मारना

घर में जब बिर्रा छत्ता बना लेती है तो उसे भगाने के लिए छत्ते में आग लगा देते हैं

घर फूटे, गँवार लूटे

घर में फूट हो तो दूसरे लाभ उठाते हैं

घर रहे न तीरथ गए मूँड मूँडा के जोगी भए

किसी काम के न रहे सारी मेहनत बेकार गई, मुफ़्त का अपमान हुआ लाभ कोई न हुआ

घर रहे तो घर को खाए, बाहर रहे तो बाहर को खाए

घर में रहता है तो घर वालों को परेशान करता है, बाहर रहता है तो बाहर वालों को

घर से आए हैं संदेसा लाए हैं

जब किसी शख़्स पर कुछ बनी हो और इस से ज़्यादा सर गुज़शता दूसरा आदमी उस को सुनाना चाहे तो उस वक़्त वो ये फ़िक़रा कहते हैं तुम मुझ से ज़्यादा वाकिफ-ए-हाल नहीं हो, कोई ग़ैर मुताल्लिक़ शख़्स दख़ल दे तो कहते हैं

घर से आए कोई, संदसा दे कोई

रुक : घर से आए हैं अलख

घर से बाहर भला

निकम्मे या लड़ाकू पति के लिए कहा जाता है

घर से खोएँ तो आँखें रोएँ

नुक़्सान उठा कर तजुर्बा होता है, कुछ खो के अक़ल आती है

घर से खोया तो आँखे खुलीं

कुछ खो कर अनुभव प्राप्त होता है

घर सुख तो बाहर चैन

घर का ठीक ठीक प्रबंधन करना, घर का ख़र्च चलाना

घर तंग बहू जबर जंग

अपनी क्षमता से अधिक कार्य करने के अवसर पर कहते हैं

घर तंग रोज़ी फ़राख़

धन में उदारता होनी चाहिए घर की तंगी में बसर हो सकती है

घर वाले का एक घर, निघरे के सौ घर

लुच्चों का हर जगह ठिकाना हो जाता है, निश्चिंत और भिक्षुक जहां भी ठहर जाए वही उस का घर है, जिस के पास घर न हो वह पथिक है

घर वाली से घर होता है

घर की रौनक़ पत्नी से ही होती है

घर यार के, पूत भतार के

यह कहावत विलासी आदमी के सम्बन्ध में कहते हैं जिस के बच्चे वेश्या के यहां होते हैं और अपना कोई रहने का स्थान नहीं होता

घर, घोड़ा, गाड़ी, इन तीनों के दाम खड़ा-खड़ी

घर, घोड़ा और गाड़ी इन तीनों के दाम नक़द ले लेने चाहिए, इनके उधार बेचने में बहुत परेशानी होती है एवं ये तीनों चीज़ें अपने स्थान पर ही बिकती हैं, अर्थात जहाँ वे देखी जा सकें

घर-घर शादी घर-घर चैन

हर जगह शांति और सुख है, अच्छा शासन हो तो लोग भी संपन्न होते हैं

घर-घर शादी, घर-घर ग़म

सभी घरों में दुख-सुख लगा रहता है, कहीं ख़ुशी है तो कहीं ग़म

घसिया घोड़ा रोटिया चाकर

किसी काम के नहीं होते

घटा की 'अक़्ल और दाढ़ी बढ़ा की

जूं जूं दाढ़ी बढ़ती गई अक़ल कम होती गई यानी उम्र बढ़ने के साथ अक़ल और समझ में इज़ाफ़ा नहीं हुआ

घटे बढ़े की सार न जाने पेट भरन से काम

बेवक़ूफ़ों को पेट पालने ही से काम होता है

घी भी खाओ और पगड़ी भी रखो

अच्छे खाने में ख़र्च करो मगर इतना कि पहनने के लिए भी बचे और सम्मान भी बना रहे

घी गिर गया तो रूखी सूखी ही भाती है

मजबूरी और शर्मिंदगी को छिपाने के लिए बात टालने के मौक़ा पर कहते हैं

घी गिर पड़ा तो रूखी सूखी ही भाती है

जब कुछ नहीं होता तो थोड़ा ही ग़नीमत है, मजबूरी और शर्मिंदगी को छिपाने के लिए बात टालने के मौक़ा पर कहते हैं

घी गिर पड़ा तो उबाली सूखी ही भाती है

जब कुछ नहीं होता तो थोड़ा ही ग़नीमत है, मजबूरी और शर्मिंदगी को छिपाने के लिए बात टालने के मौक़ा पर कहते हैं

घी जाट का और तेल हाट का

घी गाँव से मँगवाया हुआ और तेल तेली की दूकान से लिया हुआ अच्छा होता है, क्योंकि गाँव का घी ताज़ा होता है और दूकान पर तेल कई दिन का होने के कारण साफ़ मिलता है

घी का लड्डू टेढ़ा भी भला

अगर ज़्यादा फ़ायदा हो तो मामूली नुक़्सान में भी बराई नहीं होता

घी कहाँ गया खिचड़ी में, खिचड़ी कहाँ गई प्यारों के पेट में

ऐसी स्त्री के लिए कहा गया है जिसका पर-पुरुष से प्रेम हो और जो उसे घर का माल-टाल खिलाती रहती हो

घी खावत बल तन में आवे, घी आँखन की जोत बधावे

घी खाने से शरीर में बल आता है और आँखों की ज्योति बढ़ती है

घी खिचड़ी में दा'वा है

यह कहावत उस के संबंध में कहते हैं जिसे बहुत कुछ मिल जाए फिर भी अधिक का दावा करे, घर की स्वामित्व चाहते हैं

घी सँवरे सालना और बड़ी बहू का नाम

काम कोई करे और नाम किसी का हो तो कहते हैं

घोड़ा आप ही पादे , आप ही भराए

किसी काम को ख़ुद करके परेशान होना या ताज्जुब-ओ-वहम करना

घोड़ा और फोड़ा, जितना रोलो उतना बढ़े

घोड़ा और फोड़ा, इनको जितना ही सहलाओ उतना ही बढ़ते हैं

घोड़ा चाहिए बिदाइगी को ज़रा फुर्ता सा आइयो

दूल्हा के वास्ते खोड़े की ज़रूरत है जल्दी आना, हाजतमंद को बहाने से टालना

घोड़ा चाहिए बिदाइगी को ज़रा फुर्ती सा आना

दूल्हा के वास्ते खोड़े की ज़रूरत है जल्दी आना, हाजतमंद को बहाने से टालना

घोड़ा चाहिए बिदाइगी को ज़रा फुर्ती से आइयो

दूल्हा के वास्ते खोड़े की ज़रूरत है जल्दी आना, हाजतमंद को बहाने से टालना

घोड़ा चाहिए बिदाइगी को ज़रा फुर्ती से आना

दूल्हा के वास्ते खोड़े की ज़रूरत है जल्दी आना, हाजतमंद को बहाने से टालना

घोड़ा छूटे हाथी छूटे

भगवान जाने क्या परिणाम हो, ख़ुदा जाने क्या अंजाम हो, क्या नतीजा निकले

घोड़ा दाने, घास से आश्नाई करेगा तो खाएगा क्या

मुआमला की जगह मुरव्वत बरतने से नफ़ा नहीं होता, अगर कोई शख़्स अपने नफ़ा की पर्वा ना करे तो भूका मरता है

घोड़ा घास से आश्नाई करे तो भूका मरे

मुआमले की जगह मुरव्वत बरतने से नफ़ा नहीं होता, कोई शख़्स अगर अपने काम के नफ़ा की कुछ पर्वा ना करे तो गुज़ारा नामुमकिन है , मज़दूर मज़दूर ना ले तो भूका मर जाये , अपना मतलब कोई नहीं छोड़ता

घोड़ा घास से याराना करे तो भूका मरे

रुक : घोड़ा घास से यारी या आश्नाई करे तो भूका मरे

घोड़ा घास से यारी करे तो भूका मरे

रुक : घोड़ा घास से यारी या आश्नाई करे तो भूका मरे

घोड़ा घास से यारी करेगा तो खाएगा क्या

रुक : घोड़ा घास से यारी या आश्नाई करे तो भूका मरे

घोड़ा घास से आश्नाई करेगा तो खाएगा क्या

मुआमले की जगह मुरव्वत बरतने से नफ़ा नहीं होता, कोई शख़्स अगर अपने काम के नफ़ा की कुछ पर्वा ना करे तो गुज़ारा नामुमकिन है , मज़दूर मज़दूर ना ले तो भूका मर जाये , अपना मतलब कोई नहीं छोड़ता

घोड़ा घुड़साल ही में क़ीमत पाता है

हर चीज़ की क़द्र या क़ीमत उस की निर्धारित जगह पर ही होती है

घोड़ा मिला तो कोड़ा भी मिल जाएगा

बड़ा या मुश्किल का होगया तो छोटे या आसान काम की क्या फ़िक्र वो भी हो जातेगा

घोड़े गए, गधों का राज आया

योग्य व्यक्तियों के न रहने पर मूर्खों की बन आती है

घोड़े घोड़े लड़ें, मोची का ज़ीन टूटे

करे कोई भरे कोई, शक्तिशाली लोगों के झगड़ों में निर्बल का व्यर्थ में घाटा होता है, बड़ों की लड़ाई में छोटों की हानि होती है

घोड़े की हँसी और बालक का दुख जान नहीं पड़ता

घोड़े की हँसी और बच्चे की तकलीफ़ मा'लूम नहीं होती क्यूँकि ये बता नहीं सकते

घोड़ी भुसेले ही में दम लेगी

घोड़ी पर फिर कर अपने अड्डे या जाये सुकूनत ही पर आजाएगी , उस शख़्स के बारे में बोलते हैं जो घर से ज़्यादा दिन दूर ना रह सके

घोड़ी का गिरा सँभलता है नज़रों का गिरा नहीं सँभलता

इंसान एक बार नज़रों से गिर जाए तो फिर उसे इज़्ज़त नहीं मिलती

घोड़ी के लगे थे ना'ल मेंडकी बोली मेरे भी जड़ दो

बड़े आदमी की रेस में छोटे या अदना लोग भी वैसी ही आरज़ू करने लगते हैं

घोड़ी की अगर दुम बढ़ेगी तो अपनी ही मक्खियाँ उड़ावेगा

हराएक को अपना मतलब पहले मल्हूज़ होता है, हर शख़्स अपनी तरक़्क़ी से ख़ुद फ़ायदा उठाता है

घोड़ी की सवारी चलना जनाज़ा

घोड़े की सवारी ख़तरनाक होती है

घोड़ी को घर क्या दूर है

घोड़े के आगे फ़ासिला और दूरी कुछ चीज़ नहीं, काम जानने वाले के लिए कोई काम मुश्किल नहीं, चतुर व्यक्ति अपना मतलब जल्दी निकाल लेता है, चालाक शख़्स अपना मतलब जल्द निकाल लेता है

घोड़ी को इशारा गधे को लठ

रुक : घोड़े को इशारा काफ़ी है अलख, अक़लमंद को इशारा काफ़ी है

घोड़ी को इशारा काफ़ी है , गधे को लाठियाँ पीटा करो

शरीफ़ इशारों से मान जाता है, कमीना या ज़लील पट कर भी नहीं समझता

घोड़ी को लात आदमी को बात

बेवक़ूफ़ को मार-पीट की ज़रूरत होती है पर बुद्धिमान के लिए इशारा ही काफ़ी है, घोड़े को तंग और आदमी को शर्म

घोड़ी को ना'ल ठुकवाते देख कर बी मेंडकी भी ना'ल लगवाना चाहें

रुक : घोड़े के लगे थे नाल मेंढ़की बोली मेरे भी जुड़ दो

घोड़ी को रौ में डाल्ना

घोड़े को तेज़ी से मंज़िल की ओर दौड़ाना

घोड़ी को टाँग मर्द को बाँग

रुक : घोड़े को तंग आदमी को जंग, नादान सख़्ती करने से मानता है ओराक़ल मंद को इशारा काफ़ी होता है

घोड़ी पर सर से कफ़न बाँध कर बैठना चाहिये

घोड़े की सवारी ख़तरनाक होती है

घोड़ी फैंसे की लाग

घोड़ा और भैंसा जब भी मिलेंगे लड़ाई ज़रूर होगी, सख़्त दुश्मनी के लिए कहते हैं

घोड़ों को घर कितनी दूर

घोड़ों के लिए दूरी का कोई महत्व नहीं, काम करने वाले के लिए सब कुछ आसान है, बहाना करना व्यर्थ है

घोड़ों राज बैलों अनाज

शासन सेना के माध्यम और अनाज की पैदावार कृषि के माध्यम से होती है, हुकूमत फ़ौज के ज़रिये और अनाज की पैदावार खेती बाड़ी के ज़रिये होती है

घोंगे में पकाया सीपी में खाया

अधिक ग़रीबी दिखाने को कहते हैं

घुस-घुस मेरे कान में घुस

ऐसे अवसर पर बोला जाता है जब बिलकुल जगह न हो और फिर भी ज़्यादा लोगों को बिठाया जाए

घुटने नीवेंगे तो पेट ही को नीवेंगे

अपनों की तरफ़ से ढलते हैं , हर शख़्स अपनों ही का फ़ायदा ढूंढता है

घुटने पेट को ही निहरते हैं

अज़ीज़ अपने अज़ीज़ की पासदारी ज़रूर करता है , अपनों की रियायत सब को मंज़ूर होती है

घुटने पेट को जाते हैं

हर आदमी अपनों की हिमायत, तरफ़-दारी करता है

घूँसों का उधार क्या

घूओंसों में मारने की जगह फ़ौरन मारना चाहे तवक्कुफ़ अच्छा नहीं, इंतिक़ाम फ़ौरन लेना चाहिए, जुर्म की सज़ा फ़ौरन मिलनी चाहिए

गीदड़ औरों को शुगून बताए आप अपनी गर्दन कुत्तों से तुड़वाए

अपनी मुसीबत की फ़िक्र नहीं औरों को तदबीर बताते फिरते हैं, औरों को नसीहत अपने फ़ज़ीहत

गीदड़ औरों को शुगून बताएँ आप अपनी गर्दन कुत्तों से कटवाएँ

अपनी मुसीबत की फ़िक्र नहीं औरों को तदबीर बताते फिरते हैं, औरों को नसीहत अपने फ़ज़ीहत

गीदड़ जब झेरे में गिरा तो कहा आज यहीं मुक़ाम है

मजबूरी में भी घमंड से बाज़ नहीं आया, शर्मिंदा हुए पर बात वही रखी, मजबूरी में भी घमंड नहीं गया

गीदड़ के कहने से बेर नहीं पकते

اُمیدیں حسبِ خواہش پوری نہیں ہوا کرتیں

गीदड़ की जमा'दारी अटकी हुई है

ज़बरदस्ती की हुकूमत है

गीदड़ की कमबख़्ती आती है तो शहर की तरफ भागता है

जब बुरे दिन आते हैं तो उलटी ही तदबीर सूझती है

गीदड़ की सौ सालह जिंदगी से शेर की एक दिन की जिंदगी बेहतर है

कोई बड़ा कारनामा आदमी को हमेशा ज़िंदा रखता है चाहे वो उसे लम्बा जीवन प्राप्त न हुआ हो

गीदड़ उछ्ला उछ्ला जब अंगूर के ख़ोशे तक न पहुँचा तो कहा अख़ थू

बहुतेरी तदबीर की जब एक ना चली तो दूसरों ही का क़सूर बताया जब कोई तदबीर बिन नहीं पड़ती तो अपनी शर्मिंदगी मिटाने को दूसरों का क़सूर बताते हैं

गीदड़ उछला उछला जब अंगूर के ख़ोशे तक न पहुँचा तो कहा अंगूर खट्टे होते हैं

बहुतेरी तदबीर की जब एक ना चली तो दूसरों ही का क़सूर बताया जब कोई तदबीर बिन नहीं पड़ती तो अपनी शर्मिंदगी मिटाने को दूसरों का क़सूर बताते हैं

गीद-गीद गुलौंदा खाए बीर-बीर महवे तले आए

महुवा फूल है गलोंदा इसी पेड़ का फल है, मतलब यह है कि जब किसी चीज़ का चिस्का पड़ जाए तो डर जाता रहता है

गीली लकड़ी सीधी हो सकती है

बाल प्रशिक्षण संभव है

गीली सूखी दोनों जलती हैं

घोर अंधकार है, अच्छे और बुरे में फ़र्क़ नहीं है

गीत सोहे भाट ने और खेती सोहे जाट ने

जो जिस का काम है, वह उस से अच्छे से होता है अथवा उसे वही कर सकता है

गिलहरी का ठिकाना पेड़

हर एक व्यक्ति का ठिकाना निर्धारित है, हर एक व्यक्ति शांति और चैन का स्थान ढूँढता है, हर एक व्यक्ति अपने आराम का स्थान ढूँढता है

गिलहरी पेड़ा तो नही माँगती

(ओ) क्या बुरा काम (जमा) कराने को दिल चाहता है, क्या कुझाती तो नहीं

गिलहरी को पेड़ पर ठिकाना

हर वयक्ति अपने आराम की जगह पहुँचता है

गिन पोएँ सँभाल खाएँ

मुश्किल से गुज़ारा होने के अवसर पर कहते हैं

गिने गिनावे, टूटा पावे

बहुत सावधानी बरतने से घाटा होता है

गिनी बोटी नपा शोरबा

ऐसे मौक़ा पर बोलते हैं जब क़लील आमदनी की वजह से बहुत खींच तान के ख़र्च पूरा क्यू जाये या कंजूसी के साथ ख़र्च किया जाये , सिर्फ़ गुज़ारे के काबिल आमदनी

गिनी डली नपा शोरबा

रुक : ग़नी बूटी अलख

गिनी गाय में चोरी नहीं हो सकती

सावधानी बरतने से घाटा नहीं होता

गिनों न गोथों में दूल्हा की ख़ाला

کوئی بات پوچھے یا نہ پوچھے خواہ نخواہ خصوصیت اور عزیز داری جتانا

गिर गए दाँत आम खाने से

जब कोई बहाना पेश करता है, तो व्यंग्यात्मक रूप से कहते हैं तअज्जुब और हैरत के लिए

गिर पड़े की हर गंगा

यश मिलते देख समेट लेना

गिरा नहीं सँभलता

एक बार इज़्ज़त चली जाए फिर इज़़्ज़त नहीं मिलती

गिरह का देना और जूतियाँ खानी

अपना पैसा भी ख़र्च करना और बेइज़्ज़ती भी सहना के मौक़ा पर मुस्तामल

गिरह का दीजिये पर 'अक़्ल न दीजिये

मश्वरा नहीं देना चाहिए रूबा दे देना चाहिए

गिरह का दीजिए पर ज़ामिन न हो जिए

۔मिसल। ज़मानत की मज़म्मत में बोलते हैं

गिरह कट का भाई गठ कट

चोर का भाई गिरह कट , एक जैसे बदमाश

गिरह में कौड़ी नहीं और बाज़ार की सैर

पास में पैसा न होते हुए भी चीज़ें ख़रीदने को मन होना

गिरह में नहीं कौड़ी , गुट्टे वाले होत

रुक गिरह में कोड़ी नहीं अलख

गिरह से माल जाए आदमी 'अक़्ल न गँवाए

दौलत पर अक़ल की बरतरी ज़िहार करने के लिए कहते हैं

गिरे का क्या गिरेगा

जो पहले ही नष्ट हो चुका हो उस का और क्या नष्ट होगा

गिरे खम पलान भारी

सारी मुसीबत ग़रीब के सर आके पड़ती है

गिरगिट की दौड़ बटोरे तक

हर व्यक्ति अपने प्रशिक्षक पर विश्वास करता है

गिरी पड़ी के यार मुकंदा

लावारिस चीज़ को जो चाहे ले लेना है, जिस चीज़ का कोई मालिक ना हूए कोई भी ले लेता है

गिरने वाला सस्ता छूटे और गर्दन मेरी टूटे

अगर जिस पर आफ़त या मुसीबत आने वाली हो वो साफ़ बच जाये और दूसरा इत्तफ़ाक़िया इस में फंस जाये तो कहते हैं

गोंदा दे कर बुलबुल पकड़ते हैं

लालच की वजह से आदमी फंसता है

गोबर की साँझी भी फरिया ओढ़े अच्छी लगती है

कुरूप भी शृंगार की वजह से सुंदर लगती है, सज्जा बड़ी चीज़ है

गोद का छोड़ कर पेट की आस

वर्तमान छोड़कर भविष्य पर निर्भर होना

गोद का खिलाया गोद में नहीं रहता

हर समय एक जैसी स्थिति नहीं रहती, परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं

गोद में लड़का शहर में ढिंढोरा

जब कोई चीज़ पास ही रखी हो और इधर-उधर ढूँढ़ता फिरे, तब कहावत है

गोदी का लड़का मर जाए पेट आग बुझाए

बड़े से बड़े दुःख के बाद भी खाना-पीना नहीं छोड़ा जा सकता

गोदी में बैठ के आँख में उँगली

बहुत असभ्य या कृतघ्न है, जिस से फ़ायदा उठाता है उसी का अपमान करता है या उसी को नुक़सान पहुँचाता है

गोगा बड़ा कि भगवान

कमतर उच्च के बराबर नहीं हो सकता

गोल ख़ाना में चौखुंटी चीज़

बेजोड़ चीज़ बे मौक़ा बात के लिए बोलते हैं

गोला बारूद कहीं जाए, तलब से काम

स्वार्थपरता को किसी के लाभ या हानि की चिंता नहीं होती, वह अपना लाभ ही देखता है

गोली अंदर, दम बाहर

नियम हकीमों की दवाओं के मुताल्लिक़ कहते हैं , नीम हकीम या अनाड़ी की दवा इंसान को मार सकती है

गोली बीस क़दम' और चालीस क़दम

कमाल, होशयार या चालाकी ज़ाहिर करने के मौक़ा पर ज़रा से इशारे से तलब ताड़ जाना

गोंडे आई बरात बहू को लगी हगास

वक़्त पर तकलीफ़ हो गई

गोर का 'अज़ाब मुर्दा ही ख़ूब जानता है

रुक : क़ब्र का हाल मुरदा ख़ूब जानता है, जो ज़्यादा मुस्तामल है

गोर में छोटे बड़े सब बराबर हैं

मरने के बाद अमीर और ग़रीब सब यकसाँ होते हैं

गोर पर गोर नहीं होती

एक व्यक्ति के क़ाबिज़ होते हुए दूसरे का हस्तक्षेप नहीं होता

गोरे चमड़े पे न जा ये छछूँदर से बदतर है

गोरे रंग पर रीझना नहीं चाहिए क्योंकि उस की कोई हैसियत नहीं होती है नौजवान आदमी जो रंडी पर आशिक़ हो जाये उसे बतौर नसीहत कहते यहं

गोरी का जोबन चुटकियों में जाए

रूपवती स्त्री का यौवन छेड़-छाड़ में ही खत्म हुआ जा रहा है

गोरी मत कर गोरे रंग पे गुमान, ये है कोई दम का मेहमान

सुंदरता पर घमंड न कर यह कुछ समय के लिए अर्थात क्षणभंगुर है

गोरी तेरे संग में गई 'उमरिया बीत, अब चाली संग छोड़ के ये न रीत प्रीत

मरते समय आदमी आत्मा से कहता है कि हे प्रेमिका तेरे साथ आयु बीत गई, अब तू साथ छोड़ रही है तो ये प्रेम के विरुद्ध है

गोसाला-ए-मा पीर शुद व गाऊ न शुद

फ़ारसी कहात उर्दू में मुस्तामल , बढे होगए मगर बचपना ना गया

गोसाला-ए-मन पीर शुद व गाऊ न शुद

फ़ारसी कहात उर्दू में मुस्तामल , बढे होगए मगर बचपना ना गया

गोश ज़दा असरे दारद

कान पड़ी बात असर रखती है सुनी हुई बात कभी कभी काम आती है

गोश्त खा लेते हैं, हड्डियाँ फेंक देते हैं

अच्छी चीज़ इस्तिमाल की जाती है और बुरी चीज़ ज़ाए करदी जाती है, अच्छी चीज़ इस्तिमाल करनी चाहिए बरी चीज़ से हरहीज़ करना

गोश्त खाए , गोश्त लड़ाए , गोश्त ही पर सोए

(बाज़ारी) अय्याश आदमी गोश्त खाता है और अय्याशी करता है

गोश्त खाए गोश्त बढ़े , घी खाए बल होए , साग खाए ओझ बढ़े तो बल कहाँ से होए

गोश्त खाने से आदमी मोटा होता है, घी खाने से ताक़त आती है, सबज़ीयां खाने से पेट बढ़ता है मगर ताक़त नहीं अति

गोश्त खाए गोश्त बढ़े , साग खाए ओझड़ी तो बल कहाँ से हो

गोश्त खाने से आदमी उमूमन मोटा ताज़ा होता है, साग बात या सब्ज़ी खाने से पेट बढ़ता है ताक़त नहीं आती

गोश्त नाख़ूनों से कहीं जुदा होता

व्यभिचारियों का कहना है, गोश्त खाना चाहिए, संभोग करना चाहिए और औरत को साथ लेकर सोना चाहिए

गोश्त-ए-ख़र-दंदान-ए-सग

जैसे को तैसा, बुरे को बुरी वस्तु ही मिलती है

गोती नाती, क़लिया चपाती

क़िराबती मेहमान की तवाज़ो को कुल्लिया चपाती काफ़ी है तकल्लुफ़ की हाजत नहीं

गोयम मुश्किल वगरना गोयम मुश्किल

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) उस वक़्त कहते हैं जब किसी बात का कहना भी मुश्किल हो और ना कहना भी मुश्किल हो

गोयम मुश्किल वगरना नगोयम मुश्किल

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) उस वक़्त कहते हैं जब किसी बात का कहना भी मुश्किल हो और ना कहना भी मुश्किल हो

गोज़-ए-शुतुर ज़मीन का न आसमान का

बेतुकी बात तो बेतुकी है, न इधर की, न उधर की

ग्रह अपना फल कर ही जाता है

फलित ज्योतिष में विश्वास रखने वाले का कथन

गृहस्त धर्म बराबर कोई धर्म नहीं

लोगों को उनके हक़ प्रदान करना 'इबादत से बढ़ कर है, अपने बाल-बच्चों के पालन-पोषण से बेहतर कोई धर्म या पुण्य नहीं है

गृहस्ती का काम राँड का चर्ख़ा है

गृहस्ती का धुंद ख़त्म नहीं होता

गुड़ भरा हँसिया, खाते बने न उगलते

हर तरह मुश्किल है न करते बनती है न छोड़ते

गुड़ चढ़ाओ तो पाप और तेल चढ़ाओ तो पाप

यानी हर हाल में बुराई है या जो शख़्स किसी काम से राज़ी ना हो, चोरी मामूली चीज़ की भी गुनाह है

गुड़ चढ़ाओ तो पाप और तिल चढ़ाओ तो पाप

यानी हर हाल में बुराई है या जो शख़्स किसी काम से राज़ी ना हो, चोरी मामूली चीज़ की भी गुनाह है

गुड़ चुरावे तो पाप और तिल चुरावे तो पाप

यानी हर हाल में बुराई है या जो शख़्स किसी काम से राज़ी ना हो, चोरी मामूली चीज़ की भी गुनाह है

गुड़ दीए मरे तो ज़हर क्यों दीजिए

यदि बात से कोई मान जाए तो उसे क्यों मारे, सरलता से काम बन जाए तो टेढ़ा क्यों बनें

गुड़ दिए मरे तो ज़हर क्यों दीजिए

जो काम आसानी और नरमी से निकल सकता है इस की सख़्ती नहीं करना चाहिए

गुड़ हर बार मीठा होता है

नेक का हमेशा अच्छा होता है

गुड़ होगा तो मक्खियाँ बहुत आजाएंगी

दौलत होगी तो हाजतमंद बहुत आजाऐंगे

गुड़ कहने से मुँह मीठा नहीं होता

बातों से काम नहीं चलता, ख़र्च करना चाहिए

गुड़ खाएँ गुलगुलों से परहेज़

जब कोई एक बुरा काम करे और उसी तरह के दूसरे बुरे काम से परहेज़ करे तो व्यंग में ऐसा कहते हैं, बड़ी बदनामी का विचार न करना छोटी से परहेज़ करना, बड़ी बुराई की परवाह न करना और छोटी से बचना

गुड़ खाएगी तो अँधेरे में आएगी

यह कहावत पुरुष और महिला दोनों के लिए कही जाती है अर्थात यदि लाभ का लालच होगा तो आप ही समय-असमय आ जाएँगे

गुड़ खाया है तो कान छिदाने पड़ेंगे

ऐश किया है तो तक्लीफ़ भी उठानी पड़ेगी

गुड़ की जूती

जब किसी चीज़ के नायाब होने पर ग़रीब लोग उस की शक्ल तक देखने को तरसें मगर अमीर लोग उसे बेतहाशा इस्तिमाल करें तो इस मौक़ा पर कहते हैं

गुड़ न दे तो गुड़ की सी बात तो कहे

भले ही किसी को कुछ न दें पर मधुर व्यवहार करें

गुड़ से बैंगन हो गए

जब कोई महंगी चीज़ सस्ती होजाए तो कहते हैं

गुड़ से मरे तो ज़हर से क्यों मारे

जो काम नरमी से निकले तो उस में सख़्ती क्यूँ की जाये अथवा मिठास से काम चल जाए तो सख़्ती क्यूँ की जाए

गुड़िया के बियाह में चियों के बेल

(ओ) जैसा मौक़ा वबसा ख़र्च, जैसा देखना वैसा बरतना, सब सब काम सिरे से है असल

गुड़ियों के बियाह में चियों की बेल

जैसा अवसर वैसा ख़र्च, जैसा काम वैसा उपकरण

गुदड़ी में लाल नहीं छुपता

बुरों में अच्छा नहीं छुपता, सौ पर्दों में भी अच्छी चीज़ दिखाई देती है, योग्य आदमी अपनी योग्यता हर जगह मनवा लेता है

गुदड़ी से बीवी आईं शैख़ जी किनारे हो

सारा दिन तो बाज़ार में फुर्ती रही घर आ कर पर्दा याद आया

गुदड़ी से बीवी आईं शैख़ जी किनारे हुए

सारा दिन तो बाज़ार में फुर्ती रही घर आकर पर्दा याद आया, पछताने के मौक़ा पर मुस्तामल

गुद्गुदाए वहाँ तक जहाँ तक हँसती आए

मज़ाक़ और दिल लगी वहीं तक अच्छी है जहां तक ना गवार ना गुज़रे

गुफ़्तन आसान , कर्दन मुश्किल

कहना आसान है करना मुश्किल

गुह की दारू मूत

जैसा गुनाह होता है क़ाबू पाने पर वैसी ही उस की सज़ा दी जाती है

ग़ुलाम आब-कश बायद न ख़िश्त-ज़न

(फ़ारसी कहावत उर्दू में प्रयुक्त) ग़ुलाम या दास अच्छा हो तो है वरना बोझ होता है

ग़ुलाम और चूना बग़ैर पिटे काम नहीं देता

मूर्ख दंड पाए बिना काम नहीं आता, कमअक़्ल बगै़र सज़ा पाए काम नहीं आता

ग़ुलाम की ज़ात बड़ी बद-ज़ात

ग़ुलाम कमीना होता है

ग़ुलाम की ज़ात से वफ़ा नहीं

ग़ुलाम की ज़ात बेवफ़ा होती है

ग़ुलाम को और चने को मुँह न लगावे

ग़ुलाम दिलेर जाता है और चुने का मज़ा नहीं छूटता

ग़ुलाम साठ तो वो भी हाठ

निकम्मे का होना न होना बराबर है

ग़ुलाम साथ, तो भी नाथ

ग़ुलाम का ए'तिबार नहीं करना चाहिए

ग़ुलामुन 'आक़िलुन ख़ैरुम मिन शैख़िन जाहिलिन

अरबी कहावत उर्दू में प्रयुक्त, ग़ुलाम अक़्लमंद जाहिल मालिक से बेहतर है

गुंडे चले बज़ार, बिनौले ढाँक रखियो

बदमाश कोई चीज़ नहीं छोड़ते

गुनिया तो गुन कहे निर-गुनिया देख घिनाए

समझदार तो समझदारी की बात कहता है और मूर्ख इस से दूर भागता है, मूर्ख को समझदार की बात बुरी लगती है

गुंजी कबूतरी, महलों में डेरा

अयोग्य आदमी को ऊँचा स्थान मिलना, अभागे और भद्दे मनुष्य का ये रुतबा, अयोग्य आदमी को ऊँचा स्थान मिलने के संबंध में कहावत

गुर बिन ब्याकुल चेलवा, कंठ बिन बावर गीत

बगै़र गुरु के चेला इस तरह है जैसे गीत बगै़र आवाज़ के, उस्ताद के बगै़र शागिर्द बे कार है, जिस तरह गले के बगै़र गीत बे कार है

गुर बिन मिले न ज्ञान, भाग बिन मिले न सम्पत

बगै़र उस्ताद के इलम हासिल नहीं होता और बगै़र क़िस्मत के दौलत नहीं मिलती

गुर गुर बिद्या सुर सुर 'अक़्ल

प्रत्येक व्यक्ति की समझ बूझ एवं बुद्धि पृथक होती है

गुर गुर बिद्या सुर सुर ज्ञान

प्रत्येक व्यक्ति की समझ बूझ एवं बुद्धि पृथक होती है

गुर गुर बिद्या, सुर सुर ज्ञान

हर गुरु का जुदागाना इलम-ओ-अमल और हर एक सर में मुख़्तलिफ़ अक़ल और हर शख़्स की राय अलग होती है , हर उस्ताद के सिखाने का तरीक़ा अलग होता है और हर इंसान की अक़ल मुख़्तलिफ़ होती है

गुर से लपट मित्र से चोरी या हो निर्दमन या हो कोढ़ी

गुरु को जो धोका दे और दोस्त की चोरी करे वो ग़रीब हो जाएगा या कौड़ी

गुर तो ऐसा चाहिए जों सैक़ल-गर होए जनम जनम का मोरचा छिन में डाले धोए

गुरु सकली गिर की तरह होना चाहिए जो सालहा साल के ज़ंगार को पल में साफ़ कर दे, गुरु बहुत काबिल शख़्स होना चाहिए

गुर तो ऐसा चाहिए जों सक़्ली-गर होए जनम जनम का मोरचा छिन में डाले धोए

गुरु सकली गिर की तरह होना चाहिए जो सालहा साल के ज़ंगार को पल में साफ़ कर दे, गुरु बहुत काबिल शख़्स होना चाहिए

गुर तो ऐसा चाहिए जों सक़्ली-गर होए जनम जनम का मोरचा छिन में डाले खोए

गुरु सकली गिर की तरह होना चाहिए जो सालहा साल के ज़ंगार को पल में साफ़ कर दे, गुरु बहुत काबिल शख़्स होना चाहिए

गुर्दों का हार पन बिल्ली हज को चली

ज़ालिम की पार्साई से भी ज़ुलम ज़ाहिर होता है

गुरू बड़ा कि चेला

एक से बढ़ कर एक, एक से श्रेष्ठ एक

गुरू बिन मिले न ज्ञान, भाग बिन मिले न सम्पत्ति

बिन गुरू के ज्ञान नहीं मिलता और न बिना भाग्य के धन ही मिलता है

गुरू बिना गत नहीं और शाह बिना पत नहीं

कीई योग्यता और कौशल के बिना पूर्ण नहीं हो सकता और गरिमा के बिना कोई बादशाब नहीं बन सकता

गुरू गुड़ ही रहे चेले शकर हो गए

शागिर्द उस्ताद से बढ़ गए

गुरू जो कि था वो तो गुड़ हो गया वले उस का चेला शकर हो गया

जब शागिर्द अऔसताद से बढ़ जाये उस वक़्त बोला करते हैं

गुरू कीजे जान के, पानी पीजे छान के

हर काम सोच समझ कर करना चाहिये

गुरू से पहले चेला मार खाए

गुरु चेले को माँगने भेज देते हैं इसलिए अगर मार खानी पड़े तो चेले ही को मार पड़ती है

गुरू, बैद और ज्योतिषी, देव मंत्री और राज, उन्हें भेन्ट बिन जो मिले, होए न पूरन काज

गुरू, वैद्य، ज्योतिषी, देवता, वज़ीर और राजा से उस वक़्त तक काम नहीं निकलता जब तक उन को भेंट न दी जाए, अर्थात इनके पास ख़ाली हाथ नहीं जाना चाहिए

ग़ुरूर का सर नीचा

अभिमानी व्यक्ति अपमानित होता है

ग़ुस्सा बड़ा 'अक़्ल-मंद होता है

गु़स्सा कमज़ोर ही पर आता है ज़बरदस्त के सामने नहीं आता

ग़ुस्सा बहुत, ज़ोर थोड़ा, मार खाने की निशानी

कमज़ोर क्रोधित व्यक्ति प्राय: मार खाता है

ग़ुस्से में 'अक़्ल जाती रहती है

क्रोध में मनुष्य विवेक खो बैठता है

ग़ुस्से में बुराई भलाई नहीं सूझती

क्रोध के कारण नेक और बद का ख़याल नहीं रहता है

गू दर गू, मुर्ग़ी का गू

बहुत ही ख़राब वस्तु के हेतु प्रयुक्त

गू का कीड़ा गू ही में ख़ुश रहता है

जो आदमी जैसी संगत में पला होता है वैसी ही संगत उस को भली मालूम होती है

गू का पूत नोसादर

सग-ए-ज़र्द बिरादर-ए-शगाल दोनों एक ही हैं, दो बुरी बातों या बुरे शख्सों की मुसावात ज़ाहिर करने के मौक़ा पर बोलते हैं

गू खाए काल नहीं कटता

ईमान बिगाड़ने से मुसीबत दूर नहीं होती

गू की दारू मूत और मूत की दारू गू

असाध्य रोगी के लिए कहते हैं

गू में ढेला डालें न छींटें पड़ें

न दुष्ट या कमीने आदमी से मुक़ाबला न अपमानित हों

गू में ढेला फेंके गा सो छींटे खाएगा

गूओ में ढीला डालें अलख, बुरे को छेड़ने से बुरा जवाब मिलेगा, रज़बल से मुक़ाबला करना ज़िल्लत उठाना है

गू में कौड़ी गिरी तो दाँतों से उठा लूँगा

अपना हक़ ना छोड़ोंगा, कोड़ी कोड़ी वसूल करूंगा

गू नहीं, छी छी

थोड़ा अपमान हो या अधिक, दोनों तरह से अपमान में कोई अंतर नहीं, शब्दों से क्या होता है बात तो एक ही है, बुरी वस्तु हर हालत में बुरी ही रहेगी, नाम बदलने से उस का गुण नहीं बदलता

गू से निकल कर मूत में गिरे

वहीं रुके रहे, कोई फर्क नहीं पड़ा, एक कॉल से निकले और दूसरी कॉल में गिरफ्तार हो गए, जब कोई व्यक्ति किसी बुरी परिस्थिति से निकलकर वैसी ही बुरी परिस्थिति में फंस जाता है तो कहते हैं

गूड़ चुराओ तो पाप , तिल चुराओ तो पाप

चोरी मामूली चीज़ की भी गुनाह है

गूड़ खाएँ गुलगुलों से परहेज़

जिस बात या जिस चीज़ को एक सूरत में नापसंद करें उसी को दूसरी सूरत में क़बूल करलीं, शोरबा हलाल बूटी हराम, बड़ी बात को करना और छोटी से परहेज़ करना, बड़ी बदनामी का ख़्याल ना करना छोटी से परहेज़ करना, अदना बुराई से बचना और बड़ी बुराई करना , बड़ों से मिलना और छोटों से दूर रहना

गूड़ खाएँ पुवे में छेद करें

रुक : गौड़ खाईं गुलगुलों से परहेज़

गूड़ से जो मरे तो ज़हर क्यों दीजिये

जब नरमी से काम निकले तो सख़्ती की क्या ज़रूरत है

गूइठा जले गोबर हाँसे

उस मूर्ख के बारे में कहा गया है जो दूसरों की हानि पर हंसता है, भले ही उसकी अपनी हानि भी उतनी ही होने की संभावना हो

गूइठा जले उपला हाँसे

बेवक़ूफ़ के मुताल्लिक़ कहते हैं जो दूसरों के नुक़्सान पर हँसता है हालाँकि इस का अपना नुक़्सान भी इसी तरह होने वाला होता है

गूँगे का गुड़, खट्टा न मीठा

कोई बात न कह पाना, किसी बात का अर्थ न होना

गूँगे का इशारा गूँगा ही समझे

हर जिन्स अपनी ही जिन्स से ख़ूब मेल खाती है

गूँगे ने सपना देखा, मन ही मन पछताए

गूँगे को दुख होता है कि वह अपना सपना किसी को सुना नहीं सकता

गूदड़ में लाल नहीं छुपता

योग्य व्यक्ति को प्रसिद्धि मिल ही जाती है, क़ाबिल आदमी चाहे ग़रीब ही हो शोहरत पा जाता है, सच्चाई छुप नहीं सकती

गूह का कीड़ा गूह में रहे

जो आदमी जैसी संगत में पला होता है वैसी ही संगत उस को भली मालूम होती है

गूह खाए काल नहीं कटता

बुरा या नीच काम करने से मुसीबत नहीं टलती

गूह की तरह छुपाना

मुराद : बिल्ली के गो की तरह छुपाना, पूरी तरह छुपाना, ढाँकते फिरना , कमाल एहतियात से रखना

गूह में ढेला डालें न छींटें पड़ें

रुक : गाह में ढीला फेंको ना छींटें उड़ीं

गूह में ढेला फेंकेगा सो छींटे खाएगा

रज़ाले को छपड़े का सौ गालियां सुनेगा

गूह में ढेला फेंको न छींटें उड़ें

रज़ाले को छेड़ेगा सौ गालियां सुनेगा , बुरों के मुंह लगू ना गंदी बातें सुनो

गूह नहीं छी छी

बुराई या अपमान में कोई अंतर नहीं है, किसी की थोड़ी ज़िल्लत और हल्के अपमान पर बोलते हैं

गूझे का घाव रानी जाने या राव

घर की तकलीफों को घर वाले ही जानते हैं

गूज़ पर गूज़, वुज़ू पर वुज़ू

बड़े धखेबाज़ के संबंध में बोलते हैं, पाप करते रहना और क्षमा माँगते रहना, चालाकी और छल से काम लेना

गुज़र गई गुज़रान, क्या झोंपड़ी क्या मैदान

किसी ऐसे मनुष्य का कहना जो जीवन के सुख-दुख भोग चुका हो और जाने को तैयार बैठा हो

गुज़श्त-आँचा-गुज़श्त

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल)जो कुछ हुआ सौ हुआ, जो कुछ गुज़रना था सौ गुज़र गया, जो होना था होगया अब इस का क्या ज़िक्र यानी माज़ी पर अफ़सोस करना लाहासिल है

गुज़श्त-उंचा-गुज़श्त

जो गुज़र गई सौ गुज़री गई, जो हुआ सौ हुआ, जाने दीजिए, दरगुज़र कीजिए

ग्वालिन अपने दही को खट्टा नहीं कहती

अपनी वस्तु को कोई बुरा नहीं कहता

ज्ञान बढ़े सोच से, रोग बढ़े भोग से

चिंतन से ज्ञान बढ़ता है और आहार-विहार में असंयम से रोग बढ़ता है

ग्यान गुनी वो मूरख मारे, वो जीते जो पहले मारे

जो पहले काम निकाल ले या कर गुज़रे वही होशयार है, अक़लमंद आदमी बेवक़ूफ़ को मार लेता है, जो पहले हमला करे वो जीत जाता है

संदर्भग्रंथ सूची: रेख़्ता डिक्शनरी में उपयोग किये गये स्रोतों की सूची देखें .

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